शाद अब्बासी (एक शख्सियत) | नोट

चेहरे का खद व खाल नेकाबों में खो गया

आबे रवां चमकते सराबों में खो गया

गुम हो गया हूं राग व तरन्नुम की भीड़ में 

मैं ऐसा लफ्ज़ हूं जो किताबें में खो गया।

(शाद अब्बासी की किताब बिखरे मोती पेज नं 157)


किसी की शख्सियत पहचानने के लिए यह भी देखा जाता है कि उसके मरासिम व रवाबित किस से हैं। और उसके मुसाहिबीन कौन हैं। इस सिलसिले में शाद अब्बासी का जायज़ा लेते हैं तो देखते हैं कि उन के ताल्लुकात और दोस्त अहबाब अक्सर व पेशतर पढ़े-लिखे और काबिले ज़िक्र हैं। जैसे जनाब मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी साहेब, प्रोफेसर हनीफ अहमद नकवी साहेब, प्रोफेसर आफताब अहमद आफाकी साहेब, प्रोफेसर अब्दुल हक, जनाब ताजुद्दीन अशअर राम नगरी, प्रोफेसर नसीम अहमद, प्रोफेसर याकूब यावर वगैरह। इन लोगों ने शाद अब्बासी की किताबों पर अपने अपने ख्यालात का इज़हार किया है। और सिर्फ मुबारक बाद ही पेश नहीं किया है, बल्कि कई मौकों पर इन हज़रात ने शाद अब्बासी की रहनुमाई भी की है।

इस के इलावा बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं। जो शेर व शायरी से दिलचस्पी भी रखते हैं। इन से शाद अब्बासी का गहरा ताल्लुक है जैसे शोरिश बनारसी, अरसद सिद्दीकी, तरब सिद्दीकी, इम्तेयाज नदीम, नातिक बनारसी और बख्तियार नवाज़ के नाम काबिले ज़िक्र हैं।


इन के इलावा देश और विदेश में शाद अब्बासी के ताल्लुकात हैं। इन ताल्लुकात की खास वजह  यह है कि वह उर्दू ज़ुबान व अदब के लिए हमेशा फिक्र मंद रहे।

इन सब बातों से हम यह कह सकते हैं कि शाद अब्बासी की शख्सियत काबिले कद्र है। और उन्हीं के अल्फ़ाज़ में जो उन्होंने अपने लिए लिखे हैं। 

"मैं अपने अशआर की तौसीफ या अपनी नज़्म गोई की बरतरी वाज़ह करके खुद को सात सवारों में शामिल कर रहा हूं, अगर मुझ पर इन राहों में थोड़ी धूल भी जम जाए तो खुद को खुश नसीब समझूं"।

  जारी है......

शाद अब्बासी (एक शख्सियत) भाग 10


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