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ना जानें क्यों समझते हैं वह बहुत देर से 

और पछताते हैं फिर बहुत देर तक

मुहब्बतों को निभाने का हुनर जो रखते हैं 

शादमां दिल और सुकून वह रखते हैं.....

सुबह के समय बनारस घाट का शांत दृश्य, नाव और उगता हुआ सूरज


मैं और वह


कभी खामोश रहती थी कभी वह रूठ जाती थी
मेरी बातों से ‌वह अक्सर बहुत ही टूट जाती थी

कभी मैं सोचता ही रह जाता और वह कर गुज़रती थी
मेरी आदत पे वह अक्सर बहुत अफसोस करती थी

कभी आती जो मुश्किल तो वह मज़बूत हो जाती 
मेरी कमज़ोरियों पे अक्सर वह बहुत गमगीन हो जाती

कभी करते मुहब्बत हम यह बातें वह ही कहती थी
मेरे अब के रवैए पर वह अक्सर रो भी देती थी

कभी जिससे हमारे हर तरफ खुशियां ही रहती थी
हज़ारों गम उसे देकर भी मैं अक्सर शाद रहता था

कभी करते बहुत परवाह ऐसा वह ही कहती थी
मेरी बेपरवाहियों से अक्सर वह बहुत मायूस हो जाती

कभी पीसी कभी टीवी कभी फोन पर ही मैं
लगा रहता मज़े लेता और खुश हो रहा होता

कभी कहता था उसको जान मगर फिर भी मैं
उन्हीं बेजान चीजों में मैं अपना वक्त गंवाता था

कभी खाना वह खाती थी मेरे रहते भी तन्हा वह
मैं अब तन्हा बहुत उसकी तन्हाई याद करता हूं

कभी बाहों के तकिए को तरसती वह बहुत रहती
मेरी आगोश अब अक्सर उन्हें फिर याद करती हैं

कभी समझा नहीं उसको कभी ना वक्त दिया उसको
मेरी नज़रें मेरा दिल चाहता अब अक्सर उससे मिलने को

कभी वह थी मगर हमने दिया उसको ना साथ अपना
अभी अक्सर ना जाने क्यूं मेरा दिल साथ तेरा चाहे

कभी जिससे वफा ना कि कभी जिसकी ना कि परवाह
मेरी नज़रें उसे अक्सर ना जाने खोजती क्यूं हैं

कभी रहती थी मेरे पास मेरा साया सा बन कर जो
वह अब अक्सर मुझे मिलने ख्वाबों में भी नहीं आती

कभी जीती थी वह मर-मर के और मैं खामोश रहता था
वह अब मर के भी ज़िंदा है और मैं जी के भी मरता हूं

कभी कोई सितारा आसमां पर जब भी दिखता है
मुझे अपना सितारा वह बहुत फिर याद आता है

-Little-Star












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