वो इक्कीस दिन | Lockdown | Covid | AG | Lockdown Poetry

 



#covid_19 

वो इक्कीस दिन.....

वो इक्कीस दिन........
बता गये बहुत कुछ
सिखा गये बहुत कुछ
भागते थे कभी हम
खुशियों के लिए
खुआहिशों के लिए
थी कभी फ़िक्र कपड़ों की
कभी बर्गर कभी पिज़्ज़ा
कभी बाहर के कॉफी की
ख्वाहिश थी तमन्ना थी
थी चिंता यह सब ही को ही
हो घर अच्छा और हो गाड़ी
कभी हम घूमने जाएं
कभी शिमला कभी लंदन
यही चिंता सभी को थी
कि हो दौलत बहुत सारी
यही कोशिश थी हम सब की
हो चाहे जितना जाएं थक
मगर हम को कमाना है
मगर फिर बदला ऐसा वक्त
मिला हमको समझने को
वो इक्कीस दिन.........
नहीं जाना था कहीं पर भी
ना आना था किसी को भी
है घर में जो भी पकता था
वह खाते थे सभी मिलकर
ना चिंता थी ही कपड़ों की
ना कैफे की ना होटल की
वह खाना जो कभी होटल से आता था
वह अब बनता था घर ही पर
वह जो पैसा तो बचता था
सेहत भी हो गयी बेहतर
वह जो खर्चा हज़ारों का
हज़ारों बच गये लेकिन
वो इक्कीस दिन.......
ना आएं फिर कभी लेकिन
मगर हो याद हम सबको
सबक वह जो पढ़ा सब ने
जिया जो ज़िन्दगी सब ने 
जिया सब ने वही जीवन 
नियम जो थे कोरोना के 
नहीं था उस समय कोई
ना आला ही न कोई उदना
ज़मीं का एक ज़र्रा वह
फलक का या सितारा हो 
यहां पर थे सभी यकसां

-Little-Star







Read More- The current post is continued in Khamoshiyon ko Shor
-Yeh Waqt bhi Guzar Jayega
-Housewife

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