डोर धड़कन से बंधी भाग 63 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 63 | Hindi Romantic Story

कहां चलें? गाड़ी स्टार्ट करके आदर्श मिरर में शिवाय को देख कर पूछते हैं।

कहीं भी…कहते ही शिवाय पीछे सिर टिका कर आंख बन्द कर लेते हैं।

शायद वह कुछ देर सुसताना चाहते थे। क्या पता आगे के सफर में मौका मिले ना मिले।

गाड़ी में पूरे टाइम खामोशी रही।

गाड़ी रूकते ही वह तीनों बाहर निकल जाते हैं।

गाड़ी एक फाइव स्टार होटल के सामने रूकी थी।

शिवाय और श्लोका खामोशी से आदर्श के साथ अन्दर चले जाते हैं। 

रिसेप्शन पर आदर्श को तुरंत रूम की चाबी मिल जाती है। जिसे लेकर वह लिफ्ट की तरफ बढ़ जाते हैं।

रूम में जाते ही शिवाय सोफे पर बैठ जाते हैं। जिनके एक तरफ आदर्श और दूसरी तरफ श्लोका बैठ जाती है।

उसी वक्त वेटर पानी लेकर आता है। आदर्श पानी निकाल कर शिवाय को देते हैं।

तुम वहां पर कैसे? पानी पीते हुए शिवाय को ख्याल आया।

मुग्धा अपना फोन तुम्हारे यहां भूल आई थी। वही लेने निकला था कि रास्ते में तुम दोनों मिल गए।

अब तुम बताओ क्या बात है? जब आदर्श को लगा कि शिवाय अब ठीक हैं तो वह पूछते हैं।

अभी ज़िन्दगी के कुछ इम्तिहान बाकी हैं शायद… 

वही देने निकला हूं। शिवाय खोए हुए अंदाज़ में कहते हैं।

और यह इम्तेहान तुम ने खुद चुना होगा? आदर्श उदासी से कहते हैं। उन्हें शिवाय को देख कर ही दुख हो रहा था।

सब जानते हो…फिर भी पूछ रहे हो? शिवाय मुस्कुराए।

बच्चे की उंगली जब मां-बाप पर उठ जाए। तो मां-बाप को खामोश हो जाना चाहिए। वरना बेइज़्ज़ती के सिवा कुछ नहीं मिलता।

ऐसा क्या हो गया? आदर्श ने जानना चाहा।

शिवाय ने सब कुछ सुना दिया।

तुम रो रहे हो शिवाय? आदर्श हैरानी से शिवाय को देखते हैं।

और क्या करूं मेरे दोस्त? शिवाय आंसू पोंछते हुए पूछते हैं।

और कोई रास्ता नहीं था? आदर्श परेशानी से पूछते हैं।

नहीं, क्योंकि अगर मैं घर से ना निकलता तो मेरा घर बिखर जाता। 

प्रेम काजल के प्रेम में अंधा हो चुका है। वह कुछ देख समझ नहीं रहा है। मैं अगर वहां रूकता तो मेरा कुछ भी मेरा नहीं रहता। और अगर सब कुछ उस के नाम ना करता। तो मेरा बेटा मेरा नहीं रहता।

इस लिए तुम सब कुछ छोड़ कर आ गए। आदर्श उदासी से कहते हैं।

हां, वैसे भी वह सब मेरा बनाया हुआ तो नहीं था, मुझे तो सब बना बनाया मिला था। शिवाय कहकर अपनी बात पर खुद ही हंसे।

प्रेम की बातों को दिल पर मत लो शिवाय… आदर्श शिवाय के कंधे पर हाथ रखते हैं।

तुम क्यों इतना खामोश हो श्लोका? आदर्श हैरानी से श्लोका को देखते हैं जो बिल्कुल खामोश बैठी थी।

अब कहने के लिए कुछ नहीं बचा सर…

श्लोका उदासी से कहती है।

आगे क्या प्रोग्राम है? आदर्श को दूसरी फिक्र हुई।

कोई प्रोग्राम नहीं है फिलहाल…सुबह हम यहां से निकल जायेंगे। शिवाय उठते हुए कहते हैं।

फिर…आदर्श हैरान हुए।

फिर…श्लोका तुम कहती थीं ना कि तुम्हारे बाबा कहते थे। ज़िन्दगी में अच्छे कर्म करो, मुश्किल वक्त में यही कर्म रास्ता दिखाएंगे।

मैं भी तो ज़रा देखूं कुछ अच्छे कर्म हैं भी, या मैं यू ही खुद पर फख्र कर रहा था। शिवाय मुस्कुरा दिए।

अब तुम जाओ बहुत रात हो गई है। होटल का बिल पे कर देना। और मुझे दस हज़ार रूपया कैश दे दो।

शिवाय बेड की तरफ बढ़ते हुए कहते हैं।

शिवाय तुम्हारा कार्ड…आदर्श को एक और झटका लगा।

सब छोड़ आए, कार्ड, वालेट, फोन…श्लोका शिवाय को देख कर कहती है।

और तुम भी? ओह माई गॉड…आदर्श को समझ नहीं आ रहा कि वह क्या कहे।

तुम दोनों गांव चले जाओ। अचानक आदर्श के मन में ख्याल आया।

नहीं, कल से मेरे एक नई जिंदगी की शुरूआत है। बिल्कुल शुरू से।

जहां कोई गॉड फादर नहीं है, कोई बैंक बैलेंस नहीं, कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं, हां अगर मुझे इस बीच कुछ हो गया तो श्लोका गांव चली जायेगी। लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूं, यह मेरे साथ रहेगी।

यह मेरी जीवनसाथी है…बिल्कुल असली वाली प्योर…शिवाय श्लोका की तरफ देख कर प्यार से कहते हैं।

तुम समझाओ श्लोका यह बहुत मुश्किल है। आदर्श एक बार फिर श्लोका से उम्मीद लगाते हैं।

सब वक्त के हाथों छोड़ दें। श्लोका भी उठ जाती है। जैसे अब करने को कोई बात ना हो।

आदर्श एक नज़र शिवाय को देखते हैं। और बाहर निकल जाते हैं।

श्लोका खिड़की के पास जाकर खड़ी हो जाती है। रात के अंधेरे में शायद कोई उम्मीद की किरन ढूंढ रही थी।

शिवाय उठ कर वॉशरूम चले जाते हैं। जैसे ही वह वॉशरूम से बाहर आते हैं। आदर्श नॉक करके अंदर आ जाते हैं।

यह रख लो…कोई भी ज़रूरत हो मुझे फोन करना। जहां भी जाना पहले मुझे खबर देना। आदर्श समझ चुके थे कि शिवाय रूकने वाले नहीं।

इतने पैसों की मुझे ज़रुरत नहीं है। शिवाय पैसे वापस देते हैं।

सिर्फ एक लाख है शिवाय रख लो…पैसों की ज़रूरत कदम-कदम पर पड़ेगी। आदर्श ने समझाना चाहा।

मुझे सिर्फ दस हज़ार चाहिए उस से एक पैसा ज़्यादा नहीं। शिवाय सख्त हो गए।

मेरी बात मान लो शिवाय प्लीज़…आदर्श रो दिए।

शिवाय आदर्श को गले लगा लेते हैं। कितनी ही देर दोनों खामोशी से रोते रहे।

शिवाय से अलग होते ही आदर्श दस हज़ार वहीं टेबल पर रख देते हैं। और बाकी अपनी पाकेट में रख लेते हैं।

और बाहर की तरफ बढ़ जाते हैं।

शिवाय तुम भूल जाना कि मैं तुम से मिला था। कहते ही आदर्श बाहर निकल जाते हैं।

आदर्श के अंदर अब और हिम्मत नहीं थी अपने दोस्त को टूटता हुआ देखने की।

श्लोका दरवाज़ा बन्द करके वापस आकर बेड पर बैठ जाती है।

शिवाय लेट चुके थे। श्लोका खामोशी से शिवाय के सिर को सहलाने लगती है। शिवाय की आंख बन्द थी। वह एक नज़र श्लोका को देखना चाहते थे। 

देखना चाहते थे वह अपनी जीवन संगिनी को, जो सही मानो में जीवन संगिनी थी। लेकिन शिवाय आंख ना खोल पाए। क्योंकि उन बन्द आंखों के पीछे एक समंदर था जो आंख खुलते ही बह जाता।

लाइट बंद करके श्लोका भी लेट गई। लेटते ही उसने अपनी बाहें फैला दीं। जिसमें छुपने में शिवाय ने एक पल की भी देरी नहीं की।

श्लोका की आगोश में आते ही शिवाय बेतहाशा रो दिए, वह बांध जो कब से आंसुओं को रोके हुए था। एक ज़रा सी कुरबत पर बिखर गया। 

जारी है....




  






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