मीठा ज़हर | Meetha Zehar | Heart Touching Family Story in Hindi
मीठा ज़हर... (हर मीठी बात सच नहीं होती)
घर में एक ऐसी औरत के होने का क्या फायदा... जो मुश्किल वक्त में दूसरी औरत का साथ न दे सके।
सौरभ स्क्रीन पर चमकते शब्दों में उलझा हुआ था...हर बार पढ़ने पर उसकी बैचैनी और बढ़ जाती।
सौरभ ने बाकी मैसेज को भी दोबारा पढ़ा।
मां के मैसेज अब उसके लिए आदत नहीं बोझ बन चुके थे।
वह मां और रिचा को कम ही कॉल करता था।
मां मैसेज के जरिए ही घर का हाल बता देती थीं...
और रिचा... वह तो औपचारिक बातें करके फोन रख देती थी।
बेटा, आज मुझे तेज़ बुखार था... लेकिन फिर भी मैंने घर का सारा काम किया।
रिचा स्कूल से आकर अपना खाना लेकर कमरे में चली गई।
उसे इस बात से मतलब ही नहीं कि खाना बना कैसे...
उसे न मेरी तबियत की फिक्र है और न मेरी उम्र का लिहाज़...
सौरभ ने तुरंत रिचा को मैसेज किया।
मगर मैसेज डीलिवर ही नहीं हुआ।
यह पहली बार नहीं था कि वह रिचा को मैसेज करे, और वह तुरंत जवाब दे।
कभी-कभी उसके जवाब आने में हफ्तों लग जाते... और कभी जवाब आता ही नहीं।
लेकिन आज... उसे रिचा पर गुस्सा आ रहा था।
वह परदेस में रात-दिन मेहनत कर रहा था कि घर में सब सुकून से रह सकें।
लेकिन हर दिन मां का परेशानी भरा मैसेज पढ़कर वह उलझ जाता था।
मां, मैं छुट्टी लेने की कोशिश कर रहा हूं। जैसे ही मिलेगी, घर आ जाऊंगा।
सौरभ ने मां को मैसेज किया।
नहीं बेटा... मैंने इसलिए नहीं कहा कि तुम परेशान हो जाओ।
घर मैं संभाल रही हूं। आज बीमार हूं... कल ठीक हो जाऊंगी।
तुम बस अपने काम पर ध्यान दो। और खाना समय से खाना।
मां का ममता भरा मैसेज पढ़कर उसकी आंख नम हो गई।
लेकिन फिर दूसरे ही पल रिचा का ख्याल आते ही उसका मन गुस्से से भर गया।
आज वह फैसला लेने पर मजबूर था। एक ऐसा फैसला जो उसे बहुत पहले ले लेना चाहिए था।
झटके से उठकर उसने अलमारी पर रखा सूटकेस नीचे खींच लिया।
सूककेस से उड़ती धूल उसे याद दिला रही थी कि वह पिछले पांच सालों से गांव नहीं गया था।
वह तेज़ी से सूटकेस खोलकर उसमें कपड़े रखता है।
अगले ही पल वह दरवाज़ा बंद करके बाहर निकल चुका था।
आटो में बैठते ही एक ख्याल ने उसे जकड़ लिया...शायद यह नौकरी अब वापस न मिले।
लेकिन मां का चेहरा सब पर भारी पड़ गया।
स्टेशन आते ही मन में आए हर ख्याल को वह भूल चुका था।
टिकट लेकर ट्रेन पर चढ़ते ही वह अपनी सीट पर चादर बिछा कर लेटते ही आंख बंद कर लेता है।
सुबह फोन निकालकर मैसेज देखता है। बहुत सारे मैसेज के साथ मां का भी मैसेज था।
बुखार ठीक नहीं हो रहा है। लगता है मेरी ज़िन्दगी का अंत होने वाला है।
आप ठीक हो जाएंगी। परेशान मत हों। सौरभ ने तसल्ली दी।
उसने रिचा का नम्बर चेक किया। कल वाला मैसेज उसे डिलीवर हो गया था।
तुमको इतनी भी फुर्सत नहीं कि मेरा मैसेज पढ़ लो। उसने मन ही मन रिचा से शिकवा किया।
रिचा... जिसे उसकी मां ने उसके लिए चुना था।
खूबसूरत पढ़ी-लिखी रिचा... उसे पहली ही नज़र में पसंद आ गई थी।
गांव के ही सरकारी स्कूल में वह पढ़ाती थी।
शांत और समझदार स्वाभाव की रिचा बहुत जल्द उसके आंगन में दुल्हन बनकर आ गई।
शादी के कुछ दिन बाद ही वह शहर अपनी डयूटी पर चला गया।
फिर वह दोबारा गांव नहीं जा सका। क्योंकि उसके मालिक ने कह दिया था कि अगर वह घर गया तो यह नौकरी उसे दोबारा नहीं मिलेगी।
दूसरी तरफ मां का आदेश था कि जब तक मालिक छुट्टी न दे गांव न आना। वरना बहनों की शादी कैसे होगी।
बहनों के दहेज के लिए वह रात-दिन एक करके मेहनत कर रहा था।
लेकिन आज वह अपनी मां के लिए हर वादे को तोड़ गया।
कल क्या होगा उसे नहीं पता। लेकिन आज उसे सिर्फ अपनी मां की फिक्र थी।
स्टेशन पहुंचने से लेकर घर पहुंचने तक का सफर उसके लिए बहुत भारी रहा।
सौरभ को घर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई।
दरवाज़े पर रूककर एक नज़र घर को देखता है।
आंखें नम और होंठ मुस्कुरा उठे। दिल में हलचल हुई।
घर क्या होता है...
यह परदेस में रहने वाले ही जानते हैं।
वही पुरानी कुंडी...जिसे घुमाने पर दरवाज़ा खुल गया।
धीमी रौशनी में धीरे-धीरे सौरभ अंदर बढ़ा।
नल के पास कोई बर्तन धो रहा था।
वह एक पल ठहरा...
मां...
उसने आवाज़ दी।
बर्तन धोते हाथ ठहर गए।
गर्दन मोड़ कर पीछे देखा।
आंखों को यकीन न आया।
दोनों की नज़र एक दूसरे पर थी।
दोनों ही हैरान थे।
और फिर...
खुशी और ज़ोश में वह उठने लगी।
मगर उसके कदम लड़खड़ा गए।
सौरभ तेज़ी से आगे बढ़कर हाथ थाम लेता है।
मगर यह क्या?
हाथ थामते ही वह सिहर उठा।
बुखार से तपता हुआ हाथ...
रिचा...
उसके होंठ हिले, मगर आवाज़ नहीं निकली।
सौरभ के मन में अब गुस्सा नहीं...
सिर्फ हैरानी थी।
वह सहारा देकर रिचा को साथ लिए खामोशी से कमरे की ओर बढ़ गया।
कमरे में जाकर भी दोनों खामोश थे।
दोनों आमने-सामने बैठ गए।
उनके बीच सिर्फ दूरी नहीं थी...
पांच सालों की खामोशी भी थी।
सौरभ की आंखों में सवाल थे...वह जानना चाहता था वह सच जिससे वह अंजान था।
और रिचा...
उसकी खामोशी में हर जवाब छिपा था जैसे कह रही हो...अगर वह कुछ कहती तो क्या वह यकीन कर लेता...
बिन कहे दोनों एक दूसरे से बहुत कुछ कह गए।
मां कहां हैं? सौरभ ने चुप्पी तोड़ी।
लक्ष्मण चाचा के यहां शादी में गई हैं...
तभी बाहर आहट हुई।
रिचा जल्दी से बाहर गई।
सौरभ वहीं बैठा रहा।
बर्तन अभी तक वैसे ही पड़े हैं? धोए क्यों नहीं?
मां की तेज़ आवाज़ गूंजी।
मां जी... बुखार था, इस लिए देर हो गई...
और फिर जब धोने लगी तो...
रिचा की कमज़ोर आवाज़ भी उसे सुनाई दी।
तो क्या हुआ? बुखार ही तो था... मर तो नहीं गई थी।
ये शब्द...
सौरभ के कानों में नहीं...
सीधे दिल में उतर गए।
और उसी पल...
उसे सब समझ आ गया।
मां के हर मैसेज का मतलब...
और रिचा की खामोशी भी।
मां जी वहहहह...
रिचा की अवाज़ में डर था, लेकिन चेहरे पर हल्की मुस्कान।
क्या वह-वह कर रही? बर्तन धोकर ही सोना है।
और यह तुम्हारे चेहरे पर इतनी चमक क्यों है?
मेरे जाने तक तो बेहोश पड़ी थी?
अचानक उनकी नज़र रिचा के चेहरे के चमक की ओर गई।
यह चमक मेरी वजह से है...सौरभ की आवाज़ बहुत ही धीमी थी जो अब कमरे से बाहर आ गया था।
सौरभ तुम कब आए? हैरान होने की बारी अब मां की थी।
अभी... और अब जा रहा हूं।
उसने सूटकेस उठाया।
पैसा पहले की तरह भेजता रहूंगा...
तभी सौरभ का फोन बजा।
नहीं सर... मैं घर नहीं आया।
घर में मेरा कोई नहीं है।
बस... एक रिश्ते की मौत पर अफसोस जताने आया था।
कल तक पहुंच जाऊंगा।
फोन जेब में रखकर उसने रिचा का हाथ थाम लिया।
और बिना पीछे देखे चल पड़ा।
पीछे से आवाज़ आई।
सौरभ मेरी बात तो सुनो...
मुझे माफ कर दो बेटा...
लेकिन...
इस बार सुनने वाला कोई नहीं था।TheEnd...
-Little_Star
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