Shayari | मशहूर शायरों की बेहतरीन शायरी | Best Shayari by Famous Poets

मशहूर शायरों की बेहतरीन शायरी

शायरी सिर्फ शब्दों का खूबसूरत मेल नहीं, बल्कि दिल में छिपे एहसासों को बयां करने का एक अंदाज़ है। इस पोस्ट में आपको मशहूर और प्रसिद्ध शायरों की चुनिंदा बेहतरीन शायरियाँ पढ़ने को मिलेंगी। मोहब्बत, इश्क, दर्द, तन्हाई, जिंदगी और रिश्तों जैसे अलग-अलग एहसासों को बयां करती ये शायरियाँ कभी दिल को छू जाएंगी, तो कभी आपको सोचने पर मजबूर कर देंगी।

अगर आपको खूबसूरत शायरी और हिंदी कविता पढ़ना पसंद है, तो यह संग्रह आपके लिए खास है। आइए, पढ़ते हैं मशहूर शायरों की कुछ यादगार और दिल को छू लेने वाली शायरियाँ।


सारे किरदार सो गए थक कर

बस तेरी दास्तान चलती रही

-फ़हमी बदायूंनी


तुमने नाराज़ होना छोड़ दिया,

इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं!

-फहमी बदायूनी


ज़रा सा झूठ ही कह दो मेरे बिन तुम अधूरे हो....

तुम्हारा क्या बिगड़ता है ज़रा सी बात कहने में..!!!

-परवीन शाकिर


बे लिबास आए थे इस दुनिया में ग़ालिब

एक कफ़न के लिए इतना सफ़र कर गए

-मिर्ज़ा गालिब 


हमने दर्द को अपनी रूह में बसाया है कुछ यूँ,

कि अब मुस्कुराना भी एक तजुर्बा-सा लगता है।

-आरिज़ मिर्ज़ा


हमने ख़्वाबों को दिल से लगाया यूँ ही नहीं,

हर आँसू ने कोई ना कोई दास्तान लिखी है।

-आरिज़ मिर्ज़ा


इक तुम हो कि शोहरत की हवस ही नहीं जाती

इक हम हैं कि हर शोर से उकताए हुए


उसे हम याद आते हैं फ़क़त फ़ुर्सत के लम्हों में

मगर ये बात भी सच है उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती

-वसी शाह


आंसुओं तुम मेरी पलकों पे मचलते क्यों हो,

खौफ रुसवाई है तो घर से निकलते क्यों हो।


ग़ैरों से क्या ग़म है, ग़ैरों से क्या सुनना तुमने,

कुछ हम से क्या होता, कुछ हम से सुना होता।”

-चिराग हसन हसरत


हमें को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त, लेकिन

दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।

-मिर्ज़ा ग़ालिब


शाखों से टूट जाएँ, वो पत्ते नहीं हम,

आंधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे।”

-राहत इंदौरी


न जाना कि दुनिया से जाता है कोई,

बहुत देर की मेहरबाँ आते आते।

-दाग़ देहलवी


एक आदत सी बन गई है तू

और आदत कभी नहीं जाती 

-दुष्यंत कुमार


कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो

-दुष्यंत कुमार


किसी भूखे से मत पूछो मोहब्बत किस को कहते हैं

कि तुम आंचल बिछाओगे वो दस्तरख़्वान समझेगा

-ज़ुबैर अली ताबिश


अब गुज़री हुई उम्र को आवाज़ न देना,

अब धूल में लिपटा हुआ बचपन न मिलेगा।

-अनवर जलालपुरी


कोई पूछेगा जिस दिन वाक़ई ये ज़िंदगी क्या है

ज़मीं से एक मुट्ठी ख़ाक लेकर हम उड़ा देंगे

-अनवर जलालपुरी


हम तलब-ए-शोहरत हैं, हमीं नंग से क्या काम,

बदनाम जो होंगे तो क्या नाम न होगा।

-मुस्तफ़ा खान शीफ़्ता


खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं,

साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं।

-दाग देहलवी 


चल साथ कि हसरत-ए-दिल-ए-मरहूम से निकले,

आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले।

-फदवी लाहौरी

 

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,

यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।

-बशीर बद्र


अब तो इस राह से वो शख़्स गुजरता भी नहीं,

अब किस उम्मीद पे दरवाज़ा खुला रखते हैं।

-जौन एलिया


बेताबियाँ समेट कर सारे जहाँ की,

जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया

-जिगर मुरादाबादी


आँसू तो बहुत से हैं आँखों में ‘जिगर’ लेकिन 

बंध जाए सो मोती है, रह जाए सो दाना है

-जिगर मुरादाबादी



परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है,

परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता।

अगर सहरा में हैं तो आप खुद आए हैं सहरा में,

किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता।



फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था,

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था।

-अदीम हाशमी


आदमी आदमी से मिलता है

दिल मगर कम किसी से मिलता है

-जिगर मुरादाबादी


बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है,

बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है।

-बशीर बद्र


ये सोच के माँ बाप की ख़िदमत में लगा हूँ

इस पेड़ का साया मेरे बच्चों को मिलेगा

-मुनव्वर राना


रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ,

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।

कुछ तो मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख,

तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ।"

-अहमद फ़राज़


पत्ता पत्ता, बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,

जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है।

-मीर तकी मी


दिल अगर दुखा है तो ख़ामोश क्यों हो,

आँखों से बह जाने दो, राहत मिलेगी शायद।

-गुलज़ार


चलो अब अपनी हक़ीक़त से रूबरू हो लें,

बहुत हुआ किसी और की कहानी बनते बनते।

-राहत इंदौरी


उससे कहना कि मेरा साथ निभाये आ कर,

मेरा यादों से गुज़ारा नहीं होने वाला।

-हिमांशी बाबरा


जाने किस मोड़ पे ले आई मोहब्बत मुझको,

याद आता है बहुत, याद न आने वाला।

-हिमांशी बाबरा


कह दो मीर और ग़ालिब से हम भी शेर लिखते हैं,

कभी क़लम से, कभी दर्द से, कभी अश्कों से लिखते हैं।

-समीर अली



अपनी रहनुमाई पर अब गुरूर मत करना,

आप से बहुत आगे नक़्श-ए-पा हमारा है।

-मंज़र भोपाली


अब समझ लेते हैं मीठे लफ़्ज़ की कड़वाहटें,

हो गया है ज़िंदगी का तजुर्बा थोड़ा बहुत।

-मंज़र भोपाली


दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,

लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

-फैज़ अहमद फैज़


हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं,

हम से ज़माना ख़ुद है, ज़माने से हम नहीं।"

-अल्लामा इक़बाल


अब तो हर बात पे कहते हो कि 'तू क्या जाने',

तो फिर इतना तो बताओ कि ये 'कौन' जाने?

-जॉन एलिया


तेरे आने की क्या उम्मीद मगर,

कैसे कह दूँ कि इंतज़ार नहीं।

-फ़िराक़ गोरखपुरी


ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजे।

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

-जिगर मुरादाबादी 


तुम्हें पाने की ख्वाहिश अब नहीं है,

मगर तुम्हें खो देने का डर आज भी है।

-वसीम बरेलवी



मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग,

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात।

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


वो जो रखते थे हमें अपनी नज़रों में कभी,

अब उन्हें भी हमारी नज़रें तलाशती हैं।

-राहत इंदौरी


चांद पाना है तो रातों से गुज़रना होगा,

रौशनी छूनी है तो जलना भी ज़रूरी है।

-गुलज़ा



हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।

-बशीर बद्र 


सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,

इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।

-बशीर बद्र 


मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

-मजरूह सुल्तानपुरी 



सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।

-अल्लामा इक़बाल 


खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

-अल्लामा इक़बाल 


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

-मिर्ज़ा गालिब 


उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।

-मिर्ज़ा गालिब 


वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,

उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।

-साहिर लुधियानवी


और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।

-फैज़ अहमद फैज़


तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूबसूरत है,

मगर तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

-मजाज़ लखनवी



कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,

कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में गुजर जाती तो क्या बात थी।

-साहिर लुधियानवी


कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।

-राहत इंदौरी


तुझको देखे हुए सदियाँ तो नहीं गुज़री हैं,

फिर भी लगता है कि देखा ही नहीं सदियों से।


अब तो हर बात याद रहती है,

भूल जाने के बाद भी।

-जॉन एलिया


सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,

सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं।

-अहमद फराज़


रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आई,

जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए।

-फैज़ अहमद फ़ैज़


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

-मिर्ज़ा ग़ालिब


सबकी आँखों में धूल झोंक के रख दो,

कोई देख ना ले कि तन्हा हूँ मैं।

-राहत इंदौरी


हमसे न हो सका इज़हार-ए-मोहब्बत,

वो सोचते रहे हम बेवफ़ा निकले।

-अंजुम रहबर


वो मिलने आए तो यूँ लगा जैसे,

तमाम उम्र से बाकी तमन्ना पूरी हो गई।

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़



ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,

काफ़िला साथ और सफर तन्हा।

-गुलज़ा


बारिश में भीगने का मज़ा तो तब है गुलज़ार,

जब कोई साथ हो जो भीगने से रोकता रहे।

-गुलज़ा


कभी तो आ के मेरी आँखों में खो जाओ तुम

न जाने कितने दिनों से ख़्वाब नहीं आए

-अहमद फ़राज़



हमसे पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे,

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।

-बशीर बद्र



किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

-राहत इंदौरी



पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है,

जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है।

-मीर तकी मीर


मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था,

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था।

-अंजुम रहबर 



मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

मजरूह सुल्तानपुरी


कभी तो ख़ुद को पढ़ूँ मैं भी आईने की तरह,

कभी तो सामने बैठा कोई अजनबी लगे।

-परवीन शाकिर 


रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ,

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।

 -अहमद फ़राज़



हमको पूछो क्या होता है बिना दिल के जीना,

बहुत मुश्किल है दुनिया के सवालों का सफ़र करना


-जॉन एलिया

माँ की तरह इस दुनिया में, कोई और नहीं होता,

उसकी दुआ से बेहतर, कोई ज़रिया नहीं होता।

-मुनव्वर राना


दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन,

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए

-गुलज़ार 


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

-बशीर बद्र


हज़ारों जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी

ना जाने कितने सवालों की आबरू रख ले

-जिगर मुरादाबादी



कितना हसीन होता अगर हम मिल न पाए होते

तेरे बिना गुज़री ज़िंदगी आसान लगती शायद

-राहत इंदौरी



कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़

किसी की आँखों में हमको भी इंतज़ार दिखे

-बशीर बद्र



कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

-निदा फ़ाज़ली


चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ, ना तुम मुझसे कोई वादा करो

-साहिर लुधियानवी



कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया

बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया

-बशीर बद्र



तुम्हें पा कर भी न खोने का डर रहे हर दम

मोहब्बतें तो मिलीं पर सुकून कम मिला

-राहत इंदौरी



गर मुझे इश्क़ में बरबाद ही होना है तो हो

ये भी क्या कम है कि नाम तो मोहब्बत का रहे

-फैज़ अहमद फैज़



हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

-मिर्ज़ा ग़ालिब


 मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के


हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

— मिर्ज़ा ग़ालिब


मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है…

किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता…

— जावेद अख़्तर


तुमने नाराज़ होना छोड़ दिया,

इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं!

~ फहमी बदायूनी


तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद

निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो



ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में

ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे

— क़तील शिफ़ाई 


یہ جانتے ہوئے، وہ شخص اب نہیں ہے یہاں

بڑھے جو درد، تو اس کو پکار لیتے ہیں

اجمل سراج 





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