अधूरी शादी -मुकम्मल बंधन | Adhuri Shaadi | Mukammal Bandhan | Heart Touching Hindi Family Story
अधूरी शादी (मुकम्मल बंधन)...
तुम पहले उससे तलाक ले लो।
मैं तो कहती हूं आज की आज उसे बुलाओ। और पूछो कि वह ऐसा कैसे कर सकता है।
तुम इतने दिन वहां रही ही क्यों? तुम को बहुत पहले आ जाना चाहिए था।
हम लड़की वाले ज़रूर हैं मगर हम झुकने वाले नहीं।
हर कोई अपनी राय देने में आगे था। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता था।
ताशना खामोशी से बैठी सब की बात सुन रही थी। और बगल वाले कमरे में बैठी दादी के कानों तक भी हर बात पहुंच रही थी।
जब बहुत देर हो गई। और किसी की बात खत्म ही नहीं हो रही थी तो दादी से रहा नहीं गया। वह उठ कर बाहर आई।
कोई इस से यह भी पूछेगा कि उसने नाश्ता किया है या नहीं?
पहले उसे नाश्ता कराओ। दादी ने सबको देखते हुए कहा।
चलो नाश्ता करो पहले। मुझे समझ ही नहीं आया कि पहले तुमको नाश्ता दूं। ताशना की मम्मी लविशा उठते हुए बोली।
तुमको कभी कुछ समझ आया है जो आज आयेगा। दादी ने अपनी बहू लविशा को डांटा।
सास की बात सुनकर लविशा मुंह बना कर ताशना का हाथ पकड़ कर अन्दर चली गई।
दादी मैं सुबह से आई हूं, सब ने मेरा हाल पूछा। और परेशानी दूर करने की कोशिश की।
लेकिन आपने एक बार भी कुछ नहीं पूछा। शाम को चाय लेकर ताशना दादी के रूम में चली गई। और दादी के पास बैठ कर शिकवा करती है।
तुम्हारी चिंता करने वाले इतने सारे लोग तो वैसे ही घर में मौजूद हैं।
मैंने सोचा पहले तुम उन लोगों से ज्ञान ले लो। दादी ने अपना चश्मा ऊंचा करते हुए पोती के चेहरे की तरफ बहुत गौर से देखा।
ऐसे क्या देख रही हैं दादी? ताशना ने उदासी से कहा।
देख रही हूं कि मेरी पोती इतनी समझदार और दूरअंदेश हो गई है कि सात महीने में ही वह अपने सुसराल वालों को जान गई।
वरना हमने तो बरसों लगा दिये थे अपने ससुराल वालों को जानने में। दादी ने बहुत समझदारी से उसे एहसास दिलाने की कोशिश की।
मैं समझी नहीं दादी आप क्या कहना चाह रही हैं? ताशना ने परेशानी से दादी को देखा।
हैरत है... इतनी सीधी बात तुम्हें समझ नहीं आई।
और सुबह तुम बाहर अपनी मां से कह रहे थी कि तुम्हारी सास के मन में क्या चल रहा है वह तुम अच्छे से जानती हो।
जब तुम मन की बात समझ लेती हो फिर तो तुम्हें मेरे अल्फ़ाज़ समझ आ जाने चाहिए। दादी ने मासूमियत से कहा।
दादी अपनी पोती को सही राह दिखाने की कोशिश कर रही थी। ताकि उसका जीवन बर्बाद होने से बच जाए।
दादी आपको जो कहना है सीधे से कहें। मुझसे इस तरह उलझी हुई बातें ना करें। मैं वैसे ही उलझी हुई हूं। ताशना दादी की गोल-मोल बातों से उलझ गई।
क्यों उलझी हुई हो? दादी ने भी सीधे-सीधे सवाल कर दिया।
आप तो जानती हैं दादी मैं वहां पर अपने ससुराल में खुश नहीं हूं।
फिर भी आप.... ताशना ने दुख से कहना शुरू किया लेकिन फिर बात बीच में ही छोड़ दी।
क्यों खुश नहीं हो यही तो मुझे समझ नहीं आता।
जब की वहां पर सब लोग बहुत अच्छे हैं।
हम ने उनकी अच्छाई देख कर ही तुम्हारी शादी वहां की थी। दादी ने उसे समझाने की कोशिश की।
नहीं दादी, वह लोग बिल्कुल भी अच्छे नहीं हैं। ताशना ने दुख से कहा।
और अनिकेत? वह तो तुम्हारा पति हैं। तुमने उस से मिल कर बात करके उसे पसंद किया था। दादी ने जांचना चाहा।
वह भी बदल गये दादी।
इसी बात का तो मुझे सब से ज़्यादा दुख है। हर कोई बदल जाता लेकिन अनिकेत तो ना बदलते। ताशना की आवाज़ भर्रा गई।
सब कैसे बदल गये? मैं भी जानना चाहती हूं...
दादी अब पूरी तरह से मैदान में उतर गईं।
आप तो जानती ही हैं दादी कि सब शादी से पहले कितने अच्छे थे।
लेकिन शादी होते ही वह लोग बदल गये।
शादी होते ही अनिकेत चाहते थे कि घर का सब काम मैं करुं। क्योंकि उन का कहना था कि मां ने सारी ज़िन्दगी काम किया है।
उन की मां ने पापा की मौत के बाद जॉब करते हुए उन सब को पढ़ाया लिखाया बहनों की शादी की।
अनिकेत के फ्यूचर के लिए उन को किसी काम में नहीं लगाया। जब उन की पढ़ाई पूरी हो गई तभी उन्होंने काम करना शुरू किया। इस लिए अब वह उनको आराम देना चाहते हैं।
और ऊपर से मेरी वह चारों ननदें, सब इसी शहर में ब्याही हैं। कभी कोई आ रहा है तो कभी कोई। मैं क्या रात-दिन उन सब की सेवा ही करती रहूं?
मैं नहीं कर सकती यह सब। अब मैं वापस नहीं जाऊंगी। नहीं रहना मुझे वहां।
ऊपर से अनिकेत हर वक्त मां की चमचागिरी करता रहता है।
मां आपने खाना खाया, मां आप ने चाय पी, मां आप की तबियत ठीक नहीं लग रही। हर वक्त की चिंता।
ऊपर से बहनें आ जाएं तो पूछो ही मत। अनिकेत का बस चले तो अपने मुंह का निवाला भी बहनों को खिला दें।
ताशना गुस्से में बोले जा रही थी। और दादी चुपचाप सुन रही थी।
हो गई बात पूरी या कुछ बाकी है? दादी उसके चेहरे पर नज़र जमाते हुए बोलीं।
क्या बताऊं दादी? बस अब मुझे वहां नहीं रहना। ताशना ने बात ही खत्म कर दी।
एक बात कहूं?...
फिक्र तो मेरा बेटा तुम्हारे डैड भी मेरी बहुत करते हैं। आफिस से आते ही पहले मेरे पास आते हैं। फिर तुम लोगों के पास जाते हैं।
और अब जब तुम शादी के बाद ससुराल से यहां आती हो तुम्हारे भाई लोग भी सब काम छोड़ कर तुम्हारे आगे-पीछे लगे रहते हैं।
उसका क्या? दादी ने अपना चश्मा दुरूस्त किया।
डैड आप को बहुत मानते हैं। और भाई लोग मुझे इतना चाहते हैं।
मैं बहुत लकी हूं कि मुझे इतने प्यार करने वाले भाई मिले हैं। ताशना ने गर्व से कहा।
अच्छा तुम्हारा भाई अपनी बहन को प्यार करे तो वह अच्छा। और तुम्हारा पति अपनी बहन को प्यार करे तो वह बुरा।
क्या मतलब है आप का दादी? ताशना के चेहरे पर आई खुशी दोबारा गायब हो गई।
मतलब यही बेटा कि हर रिश्ते को समझने की ज़रूरत होती है।
अगर हम उसको समझ लेते हैं तो निभाने में आसानी होती है।
वरना फिर यूं ही सारी ज़िन्दगी तुम्हारी तरह शिकवा करने में बीत जाती है या फिर तलाक जैसा गलत फैसला लेकर अपनी ज़िन्दगी को बर्बाद कर लेते हैं। दादी ने समझाने की कोशिश की।
आप बताएं दादी मैं क्या करूं?
क्योंकि मैं तो आज यही सोच कर आई थी कि अब उस घर में वापस नहीं जाऊंगी। ताशना को दादी की बात कुछ-कुछ समझ आ रही थी।
मेरी एक शर्त है...
मैं जो बताऊंगी वह बात तुम को माननी पड़ेगी अगर मंज़ूर हो तो बोलूं।
वरना फिर तुम को गलत राय देने वाले तुम्हारे भाई और मां तो हैं ही।
लेकिन इतना समझ लो तुम्हारी मां और भाई तुम्हारी मुहब्बत में तुम्हें एक गलत फैसला लेने की राय दे रहे हैं।
जो आज नहीं तो कल तुम को गलत लगेगा। यह बात मेरी याद रखना।
बच्चों का घर बनाने और बिगाड़ने में मां बाप का ही हाथ होता है।
हां, यह अलग बात है कि कुछ मां-बाप मुहब्बत के नाम पर बेटी कर घर बर्बाद कर देते हैं और कुछ मां बाप अपनी समझदारी से बेटी का घर बर्बाद होने से बचा लेते हैं।
दादी खामोश होकर ताशना की तरफ देखती हैं।
ठीक है दादी मुझे आप की शर्त मंजूर है। ताशना ने फैसला लेते हुए कहा।
मैं जो बात कहने जा रही हूं वह तुम को मुश्किल ज़रूर लगेगी।
लेकिन मैं जो कहूंगी अगर तुम ने वह कर लिया तो समझ लो तुम जग जीत लोगी। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा।
अब तो वादा कर ही लिया है। अब आप जो कहेंगी मुझे मानना ही पड़ेगा। ताशना भी अब मुस्कुरा दी।
तुम आज ही अपने ससुराल जाओगी। और तुम वहां पर किसी भी बात पर गुस्सा नहीं करोगी।
किसी से नाराज़ नहीं होगी।
हर काम खुशी-खुशी करोगी।
हर किसी की बात मानोगी।
जैसा अनिकेत चाहता है तुम वैसा ही करो।
और ननदें के आने पर बिल्कुल भी नाराज़ मत होना। बल्कि यह सोचो वह तुम्हारी बहनें हैं।
खूब मुहब्बत से मिलजुल कर रहो।
और इन सब के साथ अनिकेत को भी वक्त और प्यार दो। यह काम तुम को सिर्फ एक महीना करना है।
अब आज से एक महीना बाद तुम यहां आओगी।
फिर फैसला लेंगे कि अब हमें क्या करना है।
दादी अपनी बात खत्म करके पानी का गिलास उठा कर पानी पीने लगती हैं। और ताशना अपनी दादी को देखने लगती है।
तुम वादा कर चुकी हो। अब तुमको मेरी बात माननी पड़ेगी। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा।
मैं कोशिश करूंगी दादी। देखती हूं फिर क्या होता है। ताशना ने उदासी से कहा।
दादी से किया हुआ वादा भी पूरा करना था।
ठीक है, जाओ फिर।
थोड़ी देर आराम कर लो। फिर रात का खाना खाकर जल्दी से चली जाना।
ताशना एक नज़र दादी को देखती है। और उठ कर बाहर चली गई।
यह तुम इतना तैयार क्यों हो? उसका भाई बैठते हुए बोला।
खाना खाते ही मुझे जाना है इस लिए। ताशना इत्मीनान से बोली।
लेकिन....
कोई कुछ नहीं बोलेगा।
सब लोग चुपचाप खाना खाओ। ताशना के भाई ने बोलना चाहा लेकिन दादी ने बीच में ही टोक दिया।
हर कोई खामोशी से खाना खाता रहा। सबको पता था कि दादी हर बात में नहीं बोलती हैं। लेकिन जब बोलती हैं तो फिर कोई नहीं बोलता है।
खाना खाते ही ताशना चली गई।
मां मुझे उम्मीद है... आप मेरी बेटी का घर संवार देंगी। ताशना के पापा सहगल जी खाना खाने के बाद मां से कहते हैं।
और दोनों मुस्करा देते हैं।
...
अरे ताशना...
तुम इतना अचानक...
कोई खबर नहीं।
ओह अनिकेत जी आप भी आइये आइये।
ताशना का भाई अनिकेत को देखकर हड़बड़ा कर बोला।
सब लोग अन्दर बैठ गये। उसी वक्त चाय नाश्ता आ गया।
सब बैठ कर चाय पीते हुए बातें करते रहे।
दादी अपने कमरे में बैठी हुई थी। उन्हें पता चल गया था कि ताशना और अनिकेत आये हैं।
मैं दादी से मिल लूं ज़रा। ताशना चाय पीते ही उठ गई।
ताशना अंदर जाते ही दादी के गले लग गई।
मैंने तुमसे कहा था कि एक महीने से पहले मत आना।
लेकिन अभी तो पंद्रह दिन ही हुए हैं। दादी ताशना को याद दिलाती हैं।
जी दादी... अभी हुए तो पंद्रह दिन ही, लेकिन यह पन्द्रह दिन बेहतरीन रहे।
जैसा आपने कहा था मैंने वैसा किया।
और मुझे तो हैरत हुई कि ऐसा करते हुए मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। और हर कोई खुश भी रहा। ताशना ने खुशी से बताया।
और आप को पता है दादी... इन दिनों जब मेरे ननदें घर आईं तो मुझे बड़ा मज़ा आया।
वह लोग मेरे साथ मिल कर फटाफट काम करा देती थी। और फिर हम लोग बैठ कर बातें करते थे।
वरना पहले मैं उन को देख कर गुस्सा हो जाती थी। इस लिए वह लोग ज़्यादा मुझसे बात भी नहीं करती थी।
और आज अनिकेत ज़बरदस्ती मुझे यहां सब से मिलाने लायें हैं।
वरना मैं तो मना कर रही थी।
लेकिन फिर मेरी सास ने भी कहा कि पहले घर जाओ सब से मिलो।
वह भी बहुत खुश हैं।
और अनिकेत तो हर वक्त मेरा शुक्रिया अदा करते नहीं थकते। ताशना के चेहरे पर खुशी थी।
तो क्या फैसला है अब? दादी ने चश्मा छुड़ाते हुए पूछा।
दादी वह मेरा घर है। मुझे आप की बात समझ आ गई है। अब मैं कोई गलत फैसला नहीं करुंगी।
कोई भी मुश्किल आये मैं उसे खुशी-खुशी हल करने की कोशिश करुंगी।
बिल्कुल सही कहा तुमने। मुझे खुशी है कि तुम समझ गई कि शादी का मतलब क्या होता है?
जब एक लड़का और लड़की शादी के बंधन में बंधते हैं तो वह अधूरी शादी रहती है।
और फिर जब लड़का-लड़की अपने रिश्तों को निभाते हुए अपनी ज़िम्मेदारी अदा करते हैं।
एक दूसरे के परिवार के प्रति वफादार होते हैं। और दोनों परिवार खुश रहते हैं तब यह शादी मुकम्मल होती है।
लेकिन आज कल के तुम लड़के-लड़कियां शादी के बंधन में बंधते ही आज़ाद होना चाहते हैं।
हर रिश्तों को छोड़ कर एक अलग दुनिया की तमन्ना करते हैं।
और फिर परिवार का बिखराव रिश्तों में दूरियां हो जाती हैं।
लेकिन ऐसे में कोई भी खुश नहीं रहता है। क्योंकि अधूरी खुशियों से कोई भी खुश नहीं रह सकता।
मैं चाहती हूं कि हर लड़का-लड़की अधूरी शादी को हर रिश्तों को निभाते हुए मुकम्मल करें।
जी दादी आप ने बिल्कुल सही कहा। हम ने अपनी अधूरी शादी को मुकम्मल कर लिया है।
और मैं चाहता हूं कि आप जैसा एक राहगीर हर किसी को मिले। जो सामने वाले को सही राह दिखा सके। अनिकेत अंदर आते हुए कहता है।
थोड़ी ही देर में पूरा परिवार दादी के पास था। और हर किसी के चेहरे पर खुशी थी। क्योंकि आज एक अधूरी शादी मुकम्मल हुई थी। The End......

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