डोर धड़कन से बंधी | Part 65 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 65 | Hindi Romantic Story
तुम्हें देखकर मेरे अंदर हौसला आ जाता है। मुझे अफसोस है कि मेरी वजह से तुम को बहुत सारी परेशानियां का सामना करना पड़ेगा। लेकिन मुझे उम्मीद है हमारी यह परेशानी बहुत जल्द दूर हो जायेगी। हम बहुत जल्द ओबेरॉय मेंशन चलेंगे।
वह मेरा घर, मेरा कारोबार है, मैं इतनी आसानी से उसे किसी को नहीं दे सकता। बहुत मेहनत की है हमने उसे बनाने में।
शिवाय के सामने रात वाला मंज़र घूम गया।
खुश हो लेने दो उनको… कितने दिन खुश रहेंगे, एक दिन, दो दिन, एक हफ्ता, एक महीना…
क्या मतलब? श्लोका हैरान हुई।
छोड़ो बेकार की बातें को, कुछ अपनी बातें करते हैं। शिवाय एक बार फिर मुस्कुराए।
तभी कोई दरवाज़े पर नॉक होता है।
आ जाएं… श्लोका बैठे-बैठे ही कहती है।
दरवाज़ा खुलता है वह औरत अंदर आती है।
अब्बा के रवैए के लिए मैं आप से मांफी मांगती हूं। आते ही वह सिर झुकाकर बोली।
अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं, उन्होंने जो कहा वह बिल्कुल सही कहा। शिवाय जल्दी से कहते हैं।
आप यह रख लें। वह झुक कर चूड़ियों को बेड पर रखती है।
नहीं यह हम नहीं ले सकते… हमारे बीच बात हो चुकी है। यह आप की हुई। आप इसे रखें, या फिर बेचें हमें कोई मतलब नहीं है।
शिवाय ने बात खत्म कर दी।
आप लोग अच्छे इंसान लगते हैं। इस लिए मैंने यह ले लिया था ताकि अब्बा आप को यहां रहने से मना ना कर दें। आप इसे रख लें।
वह जाने को मुड़ी…
इस एहसान की वजह…श्लोका को हैरत हुई थी उसकी बातों से।
जिस की जेब में किराए के देने के बीस हज़ार ना हो, लेकिन हाथों में करोड़ों की चूड़ियां हो। ऐसा इंसान कोई मामूली तो नहीं हो सकता।
वह बहुत समझदारी से कहती है।
आप बहुत समझदार हैं। आप कौन? श्लोका ने मुस्कुरा कर कहा।
हाजी गफूर मेरे अब्बा हैं, वह दिल के बुरे नहीं हैं। हालात से लड़ते-लड़ते वह थक चुके हैं।
मैं असमा…शौहर की मौत के बाद चार बच्चों के साथ मां-बाप की दहलीज़ पर आ गई। मेरे गम में अम्मा बहुत जल्दी चल बसीं।
सारी ज़िम्मेदारी अब्बा पर थी। मेरे दो बेटे राहिल और ताहिर, दो बेटियां सबा और शाइस्ता अब्बा की ज़िम्मेदारी हैं।
आप यहां पर आराम से रहें। कोई भी काम हो मुझे बोल सकती हैं। कहते ही वह बेड पर रखी चूड़ियां उठाकर श्लोका के हाथ में पहना देती हैं।
शिवाय और श्लोका एक दूसरे को देखते हैं।
आप के पास फोन है।
शिवाय समझ गए थे कि असमा एक समझदार और भरोसे वाली खातून हैं।
हां एक फोन घर पर रहता है जिस को ज़रूरत हो वह इस्तेमाल करता है। कोई काम था? कहते ही वह पूछती हैं।
हां एक लोग को सिर्फ खबर देना था कि हम ठीक है। शिवाय ने सोचते हुए कहा।
मैं आप को फोन देती हूं, आप बात कर लें।
नहीं मैं आप को नम्बर बताता हूं, आप खबर दे दें।
ठीक है मैं फोन लेकर आती हूं, कहते ही वह जल्दी से बाहर चली गईं फोन लेने के लिए।
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पता नहीं शिवाय कहां हैं किस हाल में हैं? आदर्श आफिस में बैठे सोच रहे थे। रात वह ठीक से सो भी नहीं पाए थे। आफिस आकर भी मन शिवाय श्लोका में ही अटका हुआ था।
सुबह उन्होंने मुग्धा के फोन के लिए स्टाफ को ही भेज दिया था। आदर्श को वहां के हालात जानने थे। लेकिन वह अंजान बने हुए थे।
पा आप कुछ परेशान लग रहे हैं कोई बात? सुबह आप ने नाश्ता भी ठीक से नहीं किया था।
आरव एक फाइल लेकर उनके केबिन में आता है। आदर्श को उदास देख कर वह पूछ लेता है। वरना आदर्श तो हर पल खुश रहने वालों में से थे।
हां सब ठीक है, ऐसी कोई बात नहीं। लाओ क्या देखना है? आदर्श फाइल की तरफ इशारा करते हैं।
आरव फाइल लेकर आदर्श के बगल में खड़े होकर उनको कुछ दिखाने लगता है तभी टेबल पर रखा आदर्श का फोन बजता है।
नम्बर चमक रहा था। आदर्श तुरंत फोन उठा लेते हैं।
आप कौन बोल रहे हैं। फोन उठाते ही उधर से आवाज़ आई।
मैं आदर्श…आदर्श जल्दी से कहते हैं।
मैं यह कह रही थी कि भाई और भाभी बिल्कुल ठीक हैं, आप चिंता ना करें। मैं उनका बहुत ख्याल रखूंगी। उधर से दोबारा आवाज़ आई। और फोन कट हो गया।
रांग नम्बर…कहते ही आदर्श फोन रख देते हैं। उनके उदास चेहरे पर चमक आ जाती है।
कौन था? आरव भी हंसते हुए पूछता है। क्योंकि उसने भी सुन लिया था।
रांग नंबर था। आदर्श जल्दी से कहते हैं।
और फाइल में नज़र जमा देते हैं। लेकिन उन का ध्यान फोन कॉल पर था।
तुम यह रख दो, मैं थोड़ी देर में बताता हूं। आदर्श फाइल बंद कर देते हैं।
ठीक है, कहते ही आरव बाहर चला जाता है।
आदर्श तुरंत फोन उठा कर पहले वह नंबर सेव करने लगते हैं।
क्या लिखूं? रांग नंबर… तुरंत मन में आता है। रांग नंबर के नाम से सेव करके वह सोचने लगते हैं।
शिवाय मुझे यकीन है यह औरत तुम्हारे बारे में ही बता रही थी। कितनी समझदारी से तुम ने मुझ तक खबर पहुंचा दी। तुम जानते थे कि मैं तुम्हारे लिए परेशान हूंगा।
मुझे खुशी है शिवाय की तुम सही लोगों में पहुंचे हो। तुम्हारी नेकियों ने काम करना शुरू कर दिया है शिवाय…आदर्श सुकून से सोचते हैं।
और फोन रख देते हैं। अब देखना यह है कि घर के बाकी लोगों को तुम्हारे बारे में कब पता चलता है।
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पता नहीं मौम और डैड कहां हैं? अभी तक आए नहीं। प्रेम परेशानी से घड़ी देखते हुए कहता है।
कल रात से तुम उनके लिए परेशान हो। और उन को कोई फिक्र ही नहीं है कि कम से कम एक कॉल ही कर दें। काजल गुस्से से कहती है।
फोन कहां से करेंगे? उन का फोन तो तुम्हारी वजह से यहीं पर है। प्रेम को भी गुस्सा आ जाता है।
मैंने ऐसा क्या कह दिया कि वह फोन छोड़ कर ही चले गए। काजल अपना पलड़ा झाड़ती है।
दुआ करो कि शाम तक वह वापस आ जाएं, वरना बहुत बुरा होगा। प्रेम की टेंशन बढ़ती जा रही थी।
ज़्यादा टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं आज नहीं तो कल आ जायेंगे। कहते हुए काजल गुस्से से पैर पटकते हुए ऊपर चली जाती है।
मौम डैड आप लोग आ जाएं…प्रेम मन ही मन दुआ करता है।
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दोपहर के खाने का श्लोका ने मना कर दिया था। शिवाय बाहर चले गए। और श्लोका बैठ कर आगे के बारे में सोचने लगती है कि उसे क्या करना है। उस के पास फोन नहीं था, लैपटॉप नहीं था। उसे अपनी क्लास स्टार्ट करनी थी लेकिन कैसे? यही सवाल उस के मन में चल रहा था।
शिवाय दोपहर के गए शाम को आए।
उनके आते ही असमा चाय और नमकीन दे जाती हैं।
शिवाय अपने और श्लोका के लिए दो जोड़ी कपड़े लेकर आए थे।
अभी इसी से काम चलाओ, फिर देखता हूं। शिवाय उसे कपड़ा दिखाते हुए कहते हैं।
…
रात का खाना भी वक्त पर असमा दे गई थीं। घर में हलचल हो गई थी। अलग-अलग आवाज़ें आ रही थीं। शायद हर कोई घर आ चुका था।
दोनों ने खाने की तरफ देखा, सिम्पल सा दाल सब्ज़ी रोटी चावल था। दोनों खाने बैठ गए। खाना बहुत ही टेस्टी था। दोनों ने अच्छे से खाया।
खाना खाकर शिवाय उसे उस मुहल्ले के बारे में बताने लगे।
आप क्या काम करेंगे? श्लोका को फिक्र हुई।
वही सब तो देखने गया था। सब देख समझ लिया है। कल सुबह देखता हूं।
अभी क्या करेंगे?
बैठ कर बातें करेंगे और क्या? वह वक्त जो काम और मोबाइल में लगा देते थे। आज वही वक्त हम एक दूसरे को देंगे। शिवाय प्यार से कहते हैं।
तभी बाहर से हाजी साहेब के तेज़-तेज़ बोलने की आवाज़ें आने लगती हैं। शायद वह लोग बाहर ही थे। कमरा इतना पास था कि बाहर की आवाज़ आसानी से अंदर आ रही थी।
जारी है…
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