डोर धड़कन से बंधी | भाग 79 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 79 | Hindi Romantic Story

छोटी-छोटी खुशियों में खुशियां ढूंढ़ता मिडिल क्लास आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए जान तोड़ मेहनत करते हैं। कभी इन को अपने मेहनत का फल मिल जाता है तो कभी यूं ही सारी ज़िन्दगी बीत जाती है।

शिवाय उदासी से कहते हैं।

आप आज कल बहुत ज़्यादा सोच रहे हैं…श्लोका परेशानी से कहती है। उसे डर लगने लगा था कि कहीं शिवाय बीमार ना हो जाएं।

जब से इन लोगों की ज़िंदगी को करीब से देखा है। मन बैचैन हो गया है। इसी लिए हर मुमकिन कोशिश करता हूं कि जितने हो सके इन की मदद कर दूं।

सुबह दुकान जाता हूं तो लोगों की लाइन लगी रहती है। चप्पल लेने के बहाने लोग मुझ से मशविरा लेते हैं। मेरी भी पूरी कोशिश होती है कि सही राय दूं। अब तो चाचा जी भी नाराज़ नहीं होते हैं। क्योंकि जो कोई भी आता है मुझ से बात करने के बाद एक चप्पल ले ही लेता है फिर चाहे वह सस्ती वाली ही क्यों ना हो।

दुकान में भीड़ देखकर बाकी लोग भी यहीं आ जाते हैं कि उस दुकान में बहुत भीड़ है, लगता है वहां पर चप्पल अच्छी है। शिवाय हंसते हुए कहते हैं।

एक बात जो मैंने सब से ज़्यादा महसूस की वह है दुआ…मैं जिस को भी सलाह देता। वह जाते वक्त बहुत सारी दुआएं देते हुए जाता। 

गरीब के पास देने के लिए भले कुछ ना हो, मगर उसके पास दुआएं होती है। और वह दुआएं देने में कभी पीछे नहीं रहते।

अगर हम उन्हें कुछ देते हैं तो बदले में वह भी हमें देकर हिसाब बराबर कर देते हैं। कुछ बाकी नहीं रखते। 

शिवाय को हर चेहरा याद आ गया। जो उन्हें दुआएं देता हुआ जाता था।

आप सही कह रहे हैं बाबा कहते थे कुछ कमाओ या ना कमाओ, मगर दुआएं जहां से मिले लेते रहना। क्योंकि यह दुआएं बहुत सी मुश्किलों को टाल देती हैं। और बहुत से कामों को बना देती हैं। श्लोका बाबा की बातों को याद करती है।

दोनों कितनी ही देर दोनों माहौल के फर्क को देखते हुए बातें करते रहे।

उन दोनों ने ज़िन्दगी के बहुत सारे पहलू देखे थे। 

दुख-खुशियां, प्यार-मोहब्बत, मिलन-जुदाई, अमीरी-गरीबी, ज़िन्दगी के हर रंग उन की आंखों में थे। 

हर तरह के रंगों को देखते हुए वह और मज़बूत और तजुर्बाकार हो गए थे। और इन सब के साथ उन दोनों का प्यार…

एक ऐसा प्यार जो वक्त के साथ ना ही कमज़ोर हुआ और ना ही कम हुआ।

आज व इतने मज़बूत हो चुके थे कि अगर उन्हें इसी तरह सारी ज़िन्दगी भी गुज़ारनी पड़ी तो वह बहुत सुकून और खुशी से गुज़ार लेंगे।

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प्लीज़ काजल अपनी यह ज़िद छोड़ दो… मैं कब से तुम को मनाने की कोशिश कर रहा हूं और तुम हो कि…प्रेम कहते हुए अपनी बात अधूरी छोड़ देता है।

मैंने जो कह दिया सो कह दिया। जब तक तुम मेरी बात नहीं मानोगे। मैं कुछ सुनने वाली नहीं। काजल ज़िद्दी लहजे में कहती है।

तुम को मेरी ज़रा भी परवाह नहीं…प्रेम उदासी से कहता है।

तुम को भी तो मेरी परवाह नहीं है। काजल तुरंत जवाब देती है।

मुझ से ज़्यादा तुम्हारे लिए पैसा अहम है? 

बेकार की बातों में उलझो मत…शिवाय सिंह ओबेरॉय के बेटे हो यह साबित करो। प्लीज़ प्रेम तुम समझो मेरी बात को…तुम तो मुझ से बहुत प्रेम करते हो, तो तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते। काजल प्रेम का हाथ थाम कर मुस्कुराते हुए उसे मनाने की कोशिश करती है।

ठीक है मैं कुछ करता हूं। लेकिन प्लीज़ तुम मुझ से नाराज़ मत हो। प्रेम उसे खुद के करीब करते हुए कहता है।

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तुम को आफिस के काम की इतनी जानकारी है उसके बाद भी क्यों मना कर रही थी।

आफिस से घर आते हुए रास्ते में आरव पूजा से पूछता है। जो गाड़ी चला रही थी।

ऐसे ही…

अब आगे क्या इरादा है?

जो आप कहें…

मैं तो कहूंगा कि रोज़ चलो आफिस।

तो फिर ठीक है फाइनल हुआ, मैं रोज़ आफिस चलूंगी।

क्या बात है…आरव हंसा।

पूजा भी हंस पड़ी।

तुम्हारे आफिस जाने का एक फायदा हुआ।

क्या?

अब घर जाने की कोई जल्दी नहीं…

अच्छा ऐसा?

हूं, ऐसा…

लेकिन मुझे घर जाने की जल्दी होगी।

क्यों?

ताकि मेरा पति जब घर आए तो मैं मुस्कुरा कर उसका स्वागत करूं।

बहुत प्यार करती हो अपने पति से?

हूं…

कितना?

खुद से ज़्यादा…

तब तो बहुत खुशनसीब है तुम्हारा पति।

खुशनसीब तो मैं हूं जो इतना प्यार करने वाला पति मिला…

मुस्कुरा कर वह एक नज़र आरव को देख कर सामने देखने लगती है। 

आरव भी मुस्कुरा कर स्टेयरिंग पर रखे उसके हाथ पर अपना रख देते हैं।

स्ट्रीट लाइट की तेज़ रौशनी रास्ते को खूबसूरत बना रही थी। सड़क पर दौड़ती हर गाड़ी को शायद अपनी मंज़िल पर पहुंचने की जल्दी थी। लेकिन शायद इन्हें कोई जल्दी नहीं थी। 

प्यार करने वाला हम सफर हो तो रास्ते खूबसूरत और मंज़िल आसान लगने लगती है।

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आप की ननद का परिवार तो बहुत अच्छा था। असमा की ननद के परिवार के जाने के बाद श्लोका असमा से कहती हैं।

जी,असमा धीरे से कहती है। क्योंकि उसके अब्बा को बेटी के ससुराल वाले ज़्यादा पसंद थे। उनके दामाद के मरने के बाद उन लोगों ने बच्चों को कुछ दिया था।

अब इतने भी अच्छे नहीं हैं। हक वाले का हक तो दे नहीं सके। हाजी साहेब नाराज़गी से कहते हैं।

अगर इन बच्चों के हक को किसी ने मारा है तो ऊपर वाला उसके बदले इन बच्चों को उससे कहीं ज़्यादा देगा। आप इस पर यकीन रखें। शिवाय तुरंत बात संभाल लेते हैं।

एक बात और…शिवाय कहकर रूके, सब के चेहरे को देखते हैं और फिर कहते हैं। अभी इन दोनों की शादी की फिक्र छोड़ दें, जो रिश्ता आया है उसे मना कर दें। 

हां अब्बा हम मना कर देते हैं। असमा भी जल्दी से कहती है।

हाजी साहेब खामोशी से उन दोनों को देखते हैं।

नानू मुझे दो और आर्डर मिल गया है वह भी बहुत बड़ा। और यह सब शिवाय अंकल की वजह से हुआ है। राहिल खुशी से कहता है।

राहिल की बात पर हाजी साहेब के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

ठीक है मना देते हैं इस रिश्ते के लिए… कहते हुए हाजी साहेब उठ खड़े होते हैं। और अपने कमरे की तरफ बढ़ जाते हैं।

तभी असमा का फोन बजता है। फोन वहीं पास में रखा था असमा जल्दी से उठा लेती है। सामने वाले की बात सुनकर असमा तुरंत फोन रख देती है।

किस का फोन था? हाजी साहेब पूछते हैं।

रॉन्ग नंबर था। कहते ही असमा किचन में चली जाती है।

शिवाय और श्लोका एक दूसरे को देखते हैं। और उठ कर रूम में चले जाते हैं। 

थोड़ी देर बाद असमा कॉफी लेकर आती है।

आप के लिए फोन था। कह रहे थे पुरानी बीमारी दोबारा लौट आई है। आप एक बार बात कर लें कि कौन बीमार है। असमा फिक्रमंदी से कहती है।

जारी है…

डोर धड़कन से बंधी भाग 78

डोर धड़कन से बंधी भाग 80












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