डोर धड़कन से बंधी | भाग 36 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 36 | Hindi Romantic Story

शिवाय की नज़र एक बार फिर शिवन्या पर थी।

शिवाय.....उसी वक्त एक लड़की आकर शिवाय के गले लग जाती है। 

आप कौन? शिवाय जल्दी से उसे खुद से दूर करते हुए कहते हैं। लेकिन वह शिवाय के बगल में बैठ जाती है।

वह सब भी हैरानी से उस लड़की को देखने लगते हैं।

शिवाय आप ने मुझे नहीं पहचाना? पहचानेंगे भी कैसे? मेरा चेहरा जो दूसरा है।

मैं श्लोका आप की अपनी श्लोका...वह धमाका करती है।

क्या????

शिवाय हैरानी से उसे देखते हैं। आदर्श जल्दी से शिवाय के कंधे पर हाथ रख लेते हैं।

शिवाय पर हाथ रखते ही आदर्श को लगा जैसे शिवाय पूरे कांप रहे हों।

शिवाय की आंखें कुछ पल को बस श्लोका को देखती रह गई।

श्लोका....?

उसने खुद से बुदबुदाते हुए कहा, जैसे अपने कानों पर यकीन नहीं था।

श्लोका की आंखों में नमी थी, मगर चेहरे पर मुस्कान....वही पुरानी सी, बस चेहरा बदला हुआ था।

हां शिवाय, मैं ही हूं। आपकी श्लोका।

वक्त ने हम दोनों को दूर कर दिया। मेरा चेहरा, नाम सब बदल गया। क्योंकि उस हादसे में मैंने अपनी याददाश्त भी खो दी थी।

लेकिन मेरा दिल वही है....जो सिर्फ आप से प्यार करता है। यह दिल सिर्फ आप के लिए धड़कता है।

एक महीने पहले मेरी याददाश्त वापस आई है। तब से मैं आप को ढूंढ़ रही हूं। और देखिए आज आप मिल गये।

शिवाय आदर्श की तरफ पीछे हटते हैं। जैसे किसी तूफान से लड़ने की तैयारी कर रहे हों।

कहने-सुनने के लिए बहुत कुछ है शिवाय....इतना सारा वक्त जो हम ने एक-दूसरे के बगैर गुज़ारा।

वक्त गवाह है हमारी मुहब्बत का। और वक्त ही गवाह बना है हमारे इस मिलन का भी। श्लोका बहुत प्यार से शिवाय के हाथ को थाम कर कहती है।

शिवाय बेसाख्ता अपना हाथ खींच लेते हैं।

आदर्श का हाथ अभी भी शिवाय के कंधे पर था। 

शिवाय की नज़र शिवन्या पर जाती है। जो उसे ही देख रही थी।

शिवन्या की आंखों में सवाल थे.... दर्द भी था और डर भी।

यह तो जानती भी नहीं श्लोका को। शिवाय उलझ गए।

आप यहां वह भी इतनी रात को? 

आदर्श संभल चुके थे। वह श्लोका से सवाल करते हैं। और बहुत गैर से उसे देखने लगते हैं। शायद कुछ तलाश रहे थे।

यहां पर सेमीनार था। मैं उसी में आई थी।

सेमीनार में तो हम लोग भी थे। आप दिखी नहीं। आदर्श ने जानना चाहा।

मैं कम्पनी के लोगों के साथ आई थी। लेकिन मैं सेमिनार में नहीं गई थी। अपने रूम में थी। मेरा मन नहीं हुआ सेमीनार में जाने का। शिवाय को तो पता ही है कि मैं ड्रेस डिजाइनर हूं। 

शायद मुझे यहां शिवाय से मिलना था। इस लिए इस सेमीनार के बहाने मैं यहां आ गई।

मुझे नींद नहीं आ रही थी। इस लिए मैं टहलते हुए इधर आ गई। और मुझे शिवाय दिख गये।

पहले तो मुझे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन फिर मेरे दिल ने कहा कि नहीं यह शिवाय ही हैं। 

श्लोका बताती जा रही थी। और वह सब खामोशी से सुन रहे थे।

आज आप हमारे साथ हैं। इससे ज़्यादा खुशी हमें और क्या होगी। बहुत रात हो गई है। या यूं कहें कि सुबह होने में ज़्यादा वक्त नहीं है। 

तो क्यों ना इस वक्त हम आराम करें। 

सुबह मिलते हैं फिर आराम से बात करते हैं।

आदर्श शिवाय को कंधे से थामे हुए उठ खड़े होते हैं। उन के साथ ही हर कोई उठ जाता है।

हां ठीक है। हम सुबह मिलते हैं। श्लोका भी उठ जाती है। और एक नज़र शिवाय को देख कर आगे बढ़ जाती है।

.....

शिवाय कमरे में अकेले खिड़की से बाहर शहर की रौशनी में खोए हुए थे। जो बहुत मद्धिम हो चुकी थी। मगर उन के मन में उस से ज़्यादा अंधेरा छाया हुआ था।

शिवाय थक चुके थे। बिस्तर पर आकर लेटते ही आंखें बन्द कर ली।

आंख बन्द करते ही वह रात याद आने लगी....जब होटल में आग लगी थी, जब वह श्लोका को पुकारता रहा था। मगर वहां पर जवाब नहीं था।

मैंने हर दिन तुम्हारा इंतेज़ार किया। लेकिन तुम नहीं आई। और आज जब मैं आगे बढ़ने लगा। तुम लौट आई।

क्यों मुझे तुम्हारे आने की खुशी नहीं हुई। 

शिवाय उठ कर टहलने लगे। जैसे अपने ही ख्यालों से भागना चाह रहे हों।

और शिवन्या....क्या अब मैं उसे छोड़ दूं। अभी तो मैंने उसके साथ सफर की शुरुआत की थी। 

क्या मैं दोबारा उसी जगह से शुरू करूं। जहां पर मेरी ज़िन्दगी खत्म हो गई थी। 

उस की आंखों से दो बूंद निकल कर गालों तक बह आई।

जब मैं तुम्हारा इंतेज़ार करता रहा। तब तुम नहीं आई। और आज जब मैं जीने लगा था, तब तुम ने वापस आकर सब कुछ उलझा दिया।

वह अब ज़मीन पर बैठ चुके थे। पीठ दीवार से टिकी थी, और हाथों में सिर दबाए शिवाय फफक पड़े।

मैं अब किसे थामूं....उस अतीत को जो लौट आया है...या उस वर्तमान को जिस ने मुझे फिर से जीना सिखाया?

कमरे में खामोशी थी, बस शिवाय की टूटी हुई सांसों की आवाज़ थी।

.....

आदर्श....

हूं.... आदर्श अपनी ही सोचों में गुम थे।

आपको इस वक्त शिवाय के पास होना चाहिए। मुग्धा पास लेटे हुए आदर्श से कहती है।

आदर्श करवट होकर मुग्धा को हैरानी से देखते हैं। जो अक्सर कहती थी कि आप को सिर्फ शिवाय से प्यार है। मुझे आप शिवाय के बाद रखते हैं। आप को बीवी से ज़्यादा दोस्त अज़ीज़ है।

हां, आप शिवाय के पास जाएं। उसे आप की ज़रूरत होगी इस वक्त।

मुग्धा आदर्श को देखते हुए कहती है जो अभी भी कहीं गुम थे।

मैंने सोचा... लेकिन मुझे लगा कि तुम को अच्छा नहीं लगेगा। इस लिए मैं नहीं गया। क्योंकि मैं सुबह से उसी के साथ था।

नहीं, अब ऐसा भी नहीं। आप की मुग्धा बदल गई है। शिवन्या ने मुझे बदल दिया। उसने मुझे आप पर विश्वास करना सिखा दिया।

वह कहती है प्यार की पहली सीढ़ी विश्वास है। और जब विश्वास ही नहीं तो फिर प्यार कैसा?

उसी ने मुझे बताया कि मैं आप पर विश्वास करूं। आप का नेचर ऐसा है कि हर कोई आप से जल्दी घुल मिल जाता है।

आप जब किसी से हंस कर बातें करते थे तो मुझे गुस्सा आता था। लेकिन अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि मुझे आप पर विश्वास है अब।

मुग्धा बहुत सुकून से हर बात आदर्श को बता रही थी। और वह हैरान थे कि मुग्धा इतना बदल गई। 

अच्छा इसी लिए अब हमारी लड़ाई नहीं होती। आदर्श मुस्कुरा दिए।

हां, मुग्धा भी मुस्कुरा दी।

जब तुम मुझ से लड़ती थी तो मुझे अपनी मौम की बात याद आ जाती थी। जो शादी के वक्त उन्होंने मुझ से कहा था कि मुग्धा से अच्छी जीवन साथी कोई और लड़की नहीं हो सकती।

मुझे गुस्सा आता था कि ऐसी लड़की मेरी ज़िन्दगी में लेकर आई हैं जो मुझे सुकून नहीं देती। वह मेरे लिए अच्छी कैसे हो सकती है।

लेकिन आज तुम्हारी बातों से समझ आ रहा है कि तुम अच्छी थी। बस मैं समझ नहीं पाया।

आदर्श मैं आप से प्यार करती थी। और आप को किसी और से बात करते देख मुझे गुस्सा आ जाता था। और फिर इसी बात पर हमारी लड़ाई हो जाती।

और फिर शिवाय के आने के बाद तो आप बिल्कुल उसी के होकर रह गये थे।

आप जाएं शिवाय के पास। कल हम दोनों साथ में वक्त  बिताएंगे।

आदर्श उठ कर बैठ गये। वह भी तो तब से शिवाय के बारे में ही सोच रहे थे। 

थैंक्स...आदर्श मुग्धा की तरफ घूम कर उस पर झुके। उसके माथे पर अपने प्यार की मुहर लगा कर वह पीछे हटे। और उठ कर बाहर चले गए।

क्या हुआ आप वापस क्यों आ गये? आदर्श जाते ही तुरंत वापस आ गये। 

रहने दो अभी...कल सुबह शिवाय से बात करता हूं। कहते ही आदर्श लेट जाते हैं।

अब वह मुग्धा को क्या बताते कि जैसे ही वह बाहर निकले। शिवाय शिवन्या के रुम में जा रहे थे।

शिवाय तुम को मैंने ही शिवन्या की तरफ बढ़ने पर उकसाया। जब कि तुम उसकी तरफ नहीं बढ़ना चाहते थे।

और अब श्लोका के आने पर तुमहारा मेरे साथ क्या रवैया रहेगा? मुझे नहीं पता। जो भी हो। लेकिन ना जाने क्यों मुझे इस माहौल से डर लग रहा है।

आदर्श मन ही मन सब सोचते रहे। और जब कुछ समझ नहीं आया तो वह सब बातों को भूलने के लिए मुग्धा की तरफ घूम गये। 

मुग्धा तुरंत अपने बिखरे हुए पति को समेट लेती है। वह जानती थी कि शिवाय आदर्श के लिए क्या हैं।

.....

आप यहां इस वक्त...?

शिवाय के अंदर आते ही शिवन्या हैरानी से पूछती है।

जब दरवाज़े पर नॉक हुआ तो वह हैरान हुए थी कि इतनी रात को कौन है। लेकिन दरवाज़े पर शिवाय को देख कर वह और हैरान हुई थी।

शिवाय अंदर की तरफ बढ़ते हैं। और बेड पर जाकर लेट जाते हैं।

शिवाय की हालत ऐसी थी कि जैसे वह अपना सब कुछ लुटा चुके हों। उनकी आंखें,उनका चेहरा किसी लुटे हुए जुआरी जैसा था। जो अपना सब कुछ गंवा चुका हो।

जारी है...

डोर धड़कन से बंधी भाग 35

डोर धड़कन से बंधी भाग 37




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