डोर धड़कन से बंधी | भाग 45 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 45 | Hindi Romantic Story

 और बाहर आसमान भी जैसे उन की कहानी सुन कर रो पड़ा...बारिश की बूंदें खिड़की पर ठहर-ठहर कर गिर रही थी।

हां श्लोका यह सच है, आज मैं तुम्हारा साथ चाहता हूं। बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं कभी श्लोका का साथ चाहता था।

शिवाय उस का हाथ थाम कर उसे देखते हुए कहते हैं।

शिवन्यि की आंखों से आंसू फिसल गए।

मैं सिर्फ आप को खुश देखना चाहती हूं। वह अपने हाथ पर रखे उस के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहती है।

आप हमेशा मुझे महसूस करेंगे। मैं साया बन कर हमेशा आप के साथ रहूंगी। क्योंकि शिवन्या श्लोका की परछाई है।

आप श्लोका को ढूंढ़ते हुए शिवन्या तक पहुंचे। मैं हमेशा आप के साथ हूं। आप हमेशा मुझे अपने पास पाएंगे।

शिवाय ने उसकी आंखों में देखा।

उन आंखों में डर भी था, मुहब्बत भी, और खुद को खो देने का खतरा भी।

तुम साया नहीं हो, शिवन्या....

तुम वो रौशनी हो जो मेरी अंधेरी दुनिया में हर रोज़ झांकती है।

मैं अब तुम्हारे बिना जीने का सोच भी नहीं सकता। लेकिन मुझे तुम्हारे बिना जीना पड़ेगा।

शिवन्या ने उसकी आंखों में नमी देखी और एक पल को खुद को रोक नहीं पाई।

वह धीरे से उसके सीने पर अपना सिर रख देती है।

शिवाय ने उसे अपनी बाहों में भर लिया....कसकर, जैसे डर हो कि अगर ढीला छोड़ दिया तो वो फिसल जायेगी।

उस पल....उनकी सांसें एक लय में चलने लगीं।

दिल की धड़कनें एक दूसरे में घुल गईं।

बाहर बारिश की हल्की बूंदें खिड़की पर गिर रही थीं।

और कमरे में सिर्फ दो धड़कनों की आवाज़ थी।

एक टुटा हुआ दिल, जो फिर से धड़कने की कोशिश कर रहा था,

और एक धड़कन, जो उसे संभालने के लिए धड़क रही थी।

काश! वक्त इसी पल रुक जाए, 

बस मैं.... और तुम। 

शिवाय उसके कान के पास फुसफुसाया।

शिवन्या ने आंखें बन्द कर लीं।

उसके आंसू शिवाय की शर्ट में समा गए,

और दोनों चुपचाप एक-दूसरे को थामे रहे....

जैसे उन की सारी तकलीफें उसी आलिंगन में पिघल जाएं।

अगर ये ज़िन्दगी हम से सब कुछ छीन ले, तब भी मैं ये एक पल नहीं भूलूंगा।

शिवाय धीमी आवाज़ में कहते हैं।

कुछ चीज़े खोने के लिए नहीं, जीने के लिए होती हैं, और मैं चाहती हूं कि आप जीएं।

शिवन्या हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान आंखों के आंसुओ में खो गई।

शिवाय ने उसकी उंगलियां अपने हाथों में कसकर थाम लीं।

तुम्हारे बिना जीना सज़ा है, शिवाय सिसके।

खिड़की के पास हवा थोड़ी तेज़ हो गई थी।

बूंदों की रफ्तार बढ़ चुकी थी...जैसे आसमान भी उन के लिए रो रहा हो।

शिवन्या ने धीरे से उसकी हथेली को अपने होंठों से छुआ। मैं चली भी जाऊं...तो यह मत सोचना कि मैं चली गई। मैं हर बारिश की बूंद में, हर ठंडी हवा में, आप के पास रहूंगी।

शिवाय ने उसे फिर अपनी तरफ खींच लिया।

और मैं....हर धड़कन में तुम्हें महसूस करूंगा।

और फिर दोनों के बीच कोई शब्द नहीं थे।

बस सांसें, आंसू और एक अनकही कसम, कि कितने भी फासले आ जाएं, मुहब्बत कभी खत्म नहीं होगी।

तुम जानती हो, शिवन्या.... मैं हर सुबह इस उम्मीद से जागता हूं कि शायद आज तुम्हें खोने का डर खत्म हो जाए।

लेकिन हर शाम यह डर और गहरा हो जाता है।

शिवाय के हाथों की पकड़ और कस गई।

शिवन्या ने उसकी आंखों में देखा,

डरें मत... मुहब्बत में डर की जगह नहीं होती।

आप की ज़िंदगी से जाकर भी मैं आप की ज़िंदगी में रहूंगी।

शिवाय ने हल्की हंसी में अपने आंसू छिपाने की कोशिश की।

तुम्हारे बिना ज़िंदगी...एक बन्द किताब के जैसे होगी। 

जिसके पन्नों पर सिर्फ तुम्हारा नाम लिखा होगा।

बाहर बादल और गरजने लगे थे,

कमरे में खिड़की पर गिरती बारिश की आवाज़ और उनकी धड़कनों की गूंज थी।

यह धड़कन....मेरी पहचान है।

जब तक यह चलती रहेगी.... मैं कहीं नहीं जाऊंगी।

शिवन्या ने उस के सीने पर हाथ रख कर कहा।

शिवाय ने उसे कस कर गले से लगा लिया...

इतना कसकर, जैसे वक्त को वहीं थाम लेना चाहते हों।

काश वक्त थम जाए, शिवन्या....

काश ये आलिंगन....आखरी नहीं, बल्कि हमारी नई शुरुआत हो।

दोनों की आंखें भीग चुकी थीं, लेकिन उस भीगने में दर्द से ज़्यादा सुकून था।

जैसे दोनों ने अपने हिस्से की सारी तकलीफें एक दूसरे के हाथों में रख दिया हों।

और उस रात.... बारिश देर तक होती रही, 

मानो आसमान भी उनके इश्क का गवाह बन कर उन्हें आशिर्वाद दे रहा हो।

जारी है...

डोर धड़कन से बंधी भाग 44

डोर धड़कन से बंधी भाग 46







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