धड़कन | भाग 11 | Dhadkan Part 11 | Heart Touching Hindi Love Story
पानी पीते ही शिवाय लेट गया। और आंख बन्द कर ली। श्लोका ने एक नज़र शिवाय को देखा और वहीं चेयर पर बैठ गई। और शिवाय के माथे पर हाथ फेरने लगती है।
तुम जाओ मैं ठीक हूं। शिवाय वैसे ही आंख बन्द किए श्लोका का हाथ हटाते हुए कहता है।
लेकिन श्लोका वापस से रख लेती है। शिवाय आंख खोल कर श्लोका को देखता है। दोनों की निगाहें मिलती हैं। और एक दूसरे पर निगाह जमी रहती है।
शिवाय श्लोका की तरफ करवट लेता है। और उसे देखता जाता है।
श्लोका अपना हाथ हटा कर उठ खड़ी होती है। लेकिन शिवाय उस का हाथ पकड़ कर वापस बैठा देता है। और उस का हाथ अपने सिर पर रख कर आंख बन्द कर लेता है।
श्लोका भी खामोशी से बैठ जाती है। और शिवाय का सिर सहलाने लगती है। बहुत देर तक वह वैसे ही उसका सिर सहलाती रहती है। जब उसे लगता है कि शिवाय को नींद आ गई है तब वह अपने रूम में चली जाती है।
शाम को सुधीर जी के साथ डाक्टर साहेब भी आते हैं। और शिवाय को देख कर कुछ दवा बदल देते हैं। अब बुखार तो ठीक है। सुस्ती रहेगी खाने-पीने का ख्याल रखें ठीक हो जायेंगे।
डाक्टर साहेब ने मुस्कुराते हुए कहा। शिवाय भी मुस्कुरा दिये। सुधीर जी डाक्टर साहेब को लेकर नीचे चले गए। और शिवाय श्लोका का इंतेज़ार करने लगे। लेकिन श्लोका नहीं आई।
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श्लोका नीचे हॉल में जाकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद अराध्या बाहर से आई तो देखा श्लोका वहां पर अकेली बैठी थी। अराध्या कुछ सोच कर श्लोका के पास जाकर बैठ गई।
क्या हुआ अकेली क्यों बैठी हो? सब ठीक तो है? अराध्या श्लोका को देखते हुए पूछती है। उस दिन की बात के बाद अराध्या को सुमन अब उतनी बुरी नहीं लगती थी जितनी पहले लगती थी।
इतने पास से और इतना ध्यान से उसने आज पहली बार श्लोका को देखा था। और उसे श्लोका बहुत ही खूबसूरत भी लगी।
कुछ खास नहीं बस कुछ सोच रही थी। श्लोका ने सोचते हुए कहा।
क्या? अराध्या ने हैरानी से पूछा।
गांव और शहर का अंतर देख रही थी। श्लोका एक बार फिर सोचते हुए कहती है।
तुम क्या गोल-मोल बातें कर रही हो। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। अराध्या ने परेशानी से कहा।
तुम्हें पता है अराध्या हमारे गांव में अगर कोई बीमार हो जाए तो परिवार का हर सदस्य उसका बहुत ध्यान रखता है। उसके खाने-पीने से लेकर उस के पास वक्त गुज़ारने तक। और मैंने देखा कल से शिवाय बीमार है। लेकिन उस के पास कौन कितनी देर बैठा। और किस ने उसके खाने-पीने का ध्यान रखा। यह मुझे नज़र नहीं आया।
श्लोका ने अराध्या को देखते हुए कहा। और अराध्या श्लोका के चेहरे को तकती ही रही।
मेरी बात बुरी लगी तो उस के लिए माफी चाहती हूं। श्लोका ने जब देखा कि अराध्या खामोश है तो उसे लगा कि उसे उस की बात बुरी लगी।
नहीं सुमन तुम ठीक कह रही हो। दरअसल हमें जिस तरह का माहौल मिला हम उसी के आदी हो गए। और सच कहूं आज तक हम ने किसी के भी बीमार होने पर कोई भी सहानुभूति नहीं जताई।
और इसी लिए तुम ने इस बात को महसूस किया होगा कि कल से भाई बीमार है। लेकिन उन के पास कोई नहीं गया। शायद हम गलत हैं। या फिर यूं कहें कि यही हमारा माहौल है।
अराध्या ने सच्चाई बताई।
लेकिन अराध्या यह गलत है हमारे पास हमारे दोस्तों के लिए तो समय है लेकिन अपने परिवार वालों के लिए नहीं ऐसा क्यों? जब कि हमारा परिवार ही हमारी पहचान है। श्लोका ने अराध्या को समझाने की कोशिश की।
अराध्या श्लोका की बातें सुनकर सोचने पर मजबूर हो गई।
चाय पियेगी? श्लोका ने अराध्या को देखते हुए पूछा।
हूं, अराध्या अभी भी सोचों में गुम थी।
कमला दो कप चाय और कुछ स्नेक्स लेकर आओ।
श्लोका ने कमला को आवाज़ दी।
उसी वक्त कमला दो चाय और स्नेक्स लेकर आ गई।
लो यह लेकर भाई के रूम में जाओ। आज भाई के साथ चाय पिओ।
श्लोका ने ट्रे उसे थमाते हुए कहा।
अराध्या ने हैरत से श्लोका को देखा।
अब जाओ चाय ठंडी हो जायेगी। और तुम्हारे भाई को ठंडी चाय पसंद नहीं है।
श्लोका ने उसे हिम्मत दी।
अराध्या आगे बढ़ी। उसी वक्त सुधीर जी भी आ गये। उन्होंने अराध्या को जाते देखा।
यह अराध्या ऊपर कहां जा रही है? सुधीर जी को हैरत हुई। क्योंकि वह शिवाय के रूम में नहीं जाती। वह क्या कोई भी नहीं जाता।
जाने दीजिए अंकल देखते हैं क्या होता है।
श्लोका ने कुछ सोचते हुए कहा।
और तुम बताओ क्या चल रहा है? सुधीर जी को शिवाय के तकिए के पास रखा क्लैचर याद आ गया।
वही जो चल रहा था। श्लोका सुमन ने लापरवाही से कहा।
कुछ नया ? सुधीर जी कुछ तलाश रहे थे।
नो, श्लोका का ध्यान इस वक्त अराध्या पर था जो कि शिवाय के रूम में गई थी।
ठीक है तुम बैठो मैं अभी आया। कह कर सुधीर जी अपने रूम में चले गए। श्लोका वहीं बैठ कर बहुत सारी चीज़ें पर गौर कर रही थी। और फिर उठ कर वह ऊपर चली गई।
शिवाय के रूम का दरवाज़ा खुला हुआ था। और अंदर से शिवाय और अराध्या के हंसने की आवाज़ आ रही थी। उन की हंसी सुन कर श्लोका के होंठों पर भी मुस्कान आ गई । और वह अपने रूम में चली गई।
उसने जब देखा कि डिनर का टाइम हो रहा है तब वह नीचे जाने के लिए बाहर निकली। उसे हैरत हुई कि शिवाय के रूम से अंकल की भी आवाज़ आ रही थी। वह तीनों किसी बात पर चर्चा कर रहे थे।
श्लोका नीचे चली गई। उसी वक्त कमला किचन से खाना लेकर निकली।
शिवाय का खाना लेकर जा रही हो? श्लोका ने पूछा।
जी, अराध्या बीबी का भी। उन्होंने कहा है वह आज डिनर शिवाय बाबा के साथ करेंगी।
कमला ने पूरी बात बताई।
श्लोका को हैरत हुई कि अराध्या इतनी जल्दी बदल गई। उसी वक्त सुधीर जी ऊपर से आ गये। और सुमन के पास बैठ गए। और उसे देखने लगे।
क्या हुआ अंकल ऐसे क्या देख रहे हैं?
श्लोका ने सुधीर जी से पूछा।
तुम ने अराध्या को समझाया उसके लिए थैंक्स। सुधीर जी ने मुहब्बत से कहा।
अरे नहीं अंकल मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। वह खुद समझदार है। श्लोका ने लापरवाही से कहा।
मैं तुम्हारा अंकल हूं। तुम जितनी भी समझदार हो। लेकिन तजुर्बे में मैं तुम से बड़ा हूं।
सुधीर जी ने हंसते हुए कहा।
जी अंकल मैंने उसे ऐहसास दिलाने की कोशिश की थी। लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि वह इतना जल्दी समझ जायेगी।
श्लोका ने सोचते हुए कहा।
चलिए डिनर करते हैं। तुम्हारी आंटी हैं नहीं और ना अमोल है। अराध्या शिवाय के साथ डिनर कर रही है। अब बचे हम दोनों।
सुधीर जी ने खुशी से कहा। आज वह बहुत खुश थे। अराध्या की वजह से।
वह दोनों डिनर करने चले गए। डिनर करते हुए बातें भी करते जा रहे थे।
डिनर करके सुधीर जी अपने रूम में चले गए। और वह अपने रूम में। उसे कुछ काम करना था वह उसको लेकर बैठ गई। जब काम करके उठी तो उस ने सोचा एक बार शिवाय से मिल लूं। फिर सोती हूं।
वह शिवाय के रुम में गई। शिवाय लेटे हुए थे नाइट लैम्प जल रहा था जिसकी मद्धिम रोशनी पूरे कमरे में फैली हुई थी। वह शिवाय के पास जाकर रुक गई। आहट पर शिवाय ने भी आंख खोल कर देखा।
कैसे हैं? श्लोका ने शिवाय की कलाई थाम कर पूछा। वह कलाई पकड़ कर बुखार चेक कर रही थी। फिर उसने माथे पर हाथ रख कर देखा।
कैसा हूं? शिवाय ने उसी से पूछ लिया।
अब तो ठीक लग रहा है। बुखार भी नहीं है और देखने में भी ठीक लग रहे हैं।
श्लोका सीरियस होकर बता रही थी। जिसे देख कर शिवाय को हंसी आ गई। श्लोका भी मुस्कुरा दी।
कब से वेट कर रहा था अभी आई हो? शिवाय ने मन ही मन सोचा मगर कह नहीं सका। सिर्फ उसे देखता रहा।
अब आप आराम करें। श्लोका ने चेयर पर बैठते हुए कहा। और तुम? शिवाय बेचैन हो गया।
मैं भी बस जा ही रही हूं।
इस से अच्छा तो मैं बीमार ही ठीक था कम से कम तुम मेरे पास तो थी। शिवाय अपनी ही सोचों में गुम था। और फिर वह आंख बन्द कर लेता है।
श्लोका शिवाय के चेहरे को देख रही थी जिस का रंग हर पल बदल रहा था। श्लोका अपनी कुर्सी को बेड के नज़दीक करके शिवाय का सिर और माथा सहलाने लगती है। शिवाय खामोशी से लेटा रहता है। उस के अन्दर एक बेचैनी आ जाती है। उसे समझ नहीं आता है कि वह क्या करे। वह आंख खोल कर श्लोका को देखता है। श्लोका को उस की आंख देख कर हैरत होती है। क्योंकि शिवाय की आंखों में एक दर्द था जिसे श्लोका समझ नहीं पाई।
शिवाय अपनी तकिए खींच कर बिल्कुल बेड के किनारे करता है जिससे वह श्लोका के बहुत ही पास आ जाता है। और फिर शिवाय आंख बन्द कर लेता है। श्लोका की नज़र शिवाय के हर हरकत पर थी।
जारी है...
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