डोर धड़कन से बंधी | भाग 88 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 88 | Hindi Romantic Story
इसनी परेशानी में भी उसे पैसों की चिंता थी। शायद गरीबी इसी का नाम है। इंसान अपनों को बचाना तो चाहता है। मगर ऐसे की उसको उस वजह से कोई दूसरी परेशानी ना खड़ी हो।
क्या इस से पहले भी कोई अटैक आया था? एक जूनियर डॉक्टर आईसीयू से बाहर आकर प्रेम को देख कर पूछते हैं।
और प्रेम सवालिया नज़रों से नताशा की ओर देखने लगता है।
नहीं, ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ। मम्मी की तबियत कभी खराब नहीं हुई। नताशा जल्दी से कहती है।
मम्मी ठीक हैं ना? नताशा परेशानी से पूछती है।
जी, उनका ट्रीटमेंट चल रहा है। कहते ही वह अंदर चले जाते हैं।
सब ठीक हो जायेगा परेशान मत हो। प्रेम उसे तसल्ली देता है।
और वह खामोशी से प्रेम को एक नज़र देखती है। और वहीं रखे सोफे पर बैठ जाती है।
एक तो मां की तबियत खराब होना…ऊपर से इतना बड़ा हास्पिटल…वह कैसे यहां का बिल जमा करेंगी। यही सोचकर उसकी परेशानी डबल हो गई थी।
शाम तक वह दोनों वैसे ही खामोशी से बैठे रहे। जब डॉक्टर ने आकर कहा कि सब ठीक है। अब कोई खतरा नहीं है तब जाकर उन्हें सुकून मिला।
मम्मी ठीक हैं अब…आप जाकर डॉक्टर से बात करें कि वह छुट्टी दे दें। हम मम्मी को दूसरे सरकारी अस्पताल में लेकर चलते हैं। डॉक्टर के जाते ही नताशा प्रेम के करीब जाकर धीरे से कहती है।
तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? उनको हार्ट अटैक आया है। यहां पर उनका इलाज अच्छे से होगा। प्रेम नाराज़गी से कहता है।
लेकिन बहुत महंगा है। यहां का बिल मैं नहीं दे पाऊंगी। वह परेशानी से कहती है।
अभी इलाज होने दो। मैं कुछ देखता हूं। प्रेम सोचते हुए कहता है।
आप क्या देखेंगे? आप की भी नई जॉब है। और इन अस्पतालों की बिल हम जैसे नहीं दे सकते। नताशा दुख से कहती है।
अभी इलाज होने दो। मैं आफिस में बात करता हूं। प्रेम ने जब देखा कि वह नहीं मान रही तो वह आफिस का नाम ले लेता है।
बिल्कुल नहीं… मैं ऐसा नहीं कर सकती। अभी मैंने ज्वाइन किया है। अभी तो मेरी जॉब भी फाइनल नहीं है। और इस तरह उधार लेते हुए मुझे पसंद नहीं है। मम्मी कहती हैं…जितनी बड़ी चादर हो, उतना ही पैर फैलाना। नताशा को मम्मी की बात याद आती है।
अच्छा ठीक है…मैं बात करता हूं। प्रेम जब देखता है कि वह बहुत परेशान है तो वह उसे तसल्ली देता है।
ठीक है अब आप जाएं। सुबह से आप परेशान हुए। आपका बहुत शुक्रिया। नताशा को अब उसके जाने का ख्याल आया।
लेकिन प्रेम उसका जवाब देने के बजाए अपने फोन में कुछ करता रहा। और वह चुपचाप बैठ गई।
अब आप जाएं… जैसे ही प्रेम फोन रखता है। वह दोबारा जाने का कहती है।
हूं…प्रेम को समझ नहीं आ रहा था कि यह अकेली क्या करेगी। कोई साथ भी नहीं आया।
उसी वक्त प्रेम के मोबाइल पर फोन आता है। बात करते ही एक डिलीवरी मैन आकर एक पैकेट प्रेम को देकर चला जाता है।
मेरे साथ आओ। प्रेम पैकेट लेकर उठ खड़ा होता है। और उसे साथ चलने का इशारा करता है।
कहां? वह हैरान हुई।
चलो तो… कहते ही वह आगे बढ़ गया।
पीछे-पीछे खामोशी से वह भी चली गई।
खाना निकालो…एक रूम में जाकर उसमें रखें टेबल पर वह पैकेट रखता है। और उससे कहता है।
मुझे नहीं खाना…आप क्यों परेशान हो रहे हैं। वह एक बार फिर नाराज़ होती है।
सुबह से भूखी हो…मैंने कुछ कहा? अब मम्मी ठीक है। चुपचाप बैठ कर खाओ। खाना ना खाने से अगर तुम ही बीमार हो गई तो मां को कौन देखेगा? वह उसे डराता है। क्योंकि उस ने देख लिया था कि वह आसानी से नहीं खाएगी।
इतना सारा खाना? खाना निकाल कर वह हैरानी से पूछती है।
मैं खाऊंगा यार…सुबह से भूखा हूं। कहते ही प्रेम वॉशरूम में हाथ धोने चला जाता है।
बाहर आकर एक थाली लेकर वह खाना शुरू कर देता है।
नताशा भी वॉशरूम से आकर खामोशी से खाने लगती है। लेकिन उसका मन मम्मी में ही अटका हुआ था।
अच्छे से खाओ। बचना नहीं चाहिए। प्रेम उसे हाथ रोकता देख सख्ती से कहते हैं। और अपनी नज़र वापस अपने खाने पर कर लेते हैं।
आप डॉक्टर से बात करके तब घर जाएं कि कल सुबह हम यहां से चले जायेंगे।
जैसे ही प्रेम का खाना पूरा होता है। वह जल्दी से कहती है।
प्रेम को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे उसे समझाए।
इस लिए वह कोई जवाब देने के बजाए फोन निकाल कर देखने लगता है।
प्रेम को इस तरह इतना सुकून से फोन देखते देख उसे उलझन होती है।
वह उठकर बाहर जाने लगती है।
सुनो…प्रेम उसे आवाज़ देता है।
उन दोनों को तो एक दूसरे का नाम नहीं पता था।
क्या हुआ? वह पलट कर नाराज़गी से कहती है।
एक मिनट रूको।
उसी वक्त एक लड़का चाय लेकर आता है। वह एक कप प्रेम को देता है। प्रेम नताशा की तरफ इशारा करता है। वह दूसरी कप नताशा को देकर बाहर चला जाता है।
इतनी मेहरबानी की ज़रूरत नहीं थी… लेकिन आप ने जो किया है यह आपका एहसान है। जिसे मैं सारी ज़िन्दगी नहीं भूल सकती। अब आप जा सकते हैं। अब जो करना है मैं कर लूंगी।
चाय पीते ही वह प्रेम को देख कर कहती है। और बाहर निकल जाती है।
प्रेम खामोशी से उसे जाता देखता रहा। और फिर वह वहीं बेड पर लेट कर आंख बन्द कर लेता है।
मैं क्यों इस लड़की के बारे में इतना सोच रहा हूं? मुझे इसकी इतनी फिक्र क्यों है? अगर वह नहीं चाहती कि उसकी मां का इलाज यहां पर हो तो मैं क्यों परेशान हूं? प्रेम अपनी ही उलझन में उलझा हुआ था। और फिर उसे नींद आ जाती है।
नताशा बाहर बैठी उसी के बारे में सोच रही थी। और उससे रहा नहीं गया तो वह दोबारा रूम में जाती है। रूम में जाकर प्रेम को सोता देख उसे हैरत होती है। यह अभी तक गया नहीं?
और फिर वह दोबारा बाहर जाकर बैठ जाती है। वह मम्मी को सिर्फ शीशे में ही से देख पाई थी। अभी मिलने की परमिशन नहीं थी।
आईसीयू के बाहर बैठी वह अपनी ही उधेड़बुन में उलझी हुई थी। क्या होगा? कैसे होगा? कहां से पैसों का इंतेज़ाम होगा?
डॉक्टर से बात हुई? प्रेम बाहर आकर उसके पास सोफे पर बैठते हुए पूछता है।
नहीं… आप जाएं। रात हो गई है। वह घड़ी देखते हुए कहती है।
तुम्हारे घर से कोई आयेगा? प्रेम को चिंता हुई कि अभी तक कोई आया नहीं।
नहीं… वह सिर हिलाती है।
क्यों? वह हैरान हुआ।
हमारा कोई नहीं है। वह सुकून से कहती है।
और वह जो लोग घर पर थे वह? प्रेम हैरान हुआ।
वह पड़ोसी थे। इतनी मदद कर दी। वही बहुत था। उसका चेहरा बिल्कुल सपाट था।
कोई रिश्तेदार? उसकी परेशानी बढ़ती जा रही थी।
नहीं…आप ने इतना किया, काफी है। डॉक्टर से बात करके कल सुबह मैं मम्मी को यहां से लेकर चली जाऊंगी। अब आप जाएं। वह अजनबी बन गई।
और उसके इस तरह कहने पर प्रेम के होंठों पर मुस्कान आ जाती है। जिसे वह जल्द ही छुपा लेता है।
मैं आता हूं…कहते ही प्रेम उठ कर चला जाता है।
एक मिनट मेरे साथ आओ…प्रेम वापस आकर उसे इशारा करता है। और रूम में चला जाता है।
बैठो…कमरे में आते ही उसे बैठने का इशारा करता है। और खुद भी बैठ जाता है। और उसे देखने लगता है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो बात वह कहने वाला है उसे शुरू कहां से करे। क्योंकि सारी ही बातें वह झूठ कहने वाला था। और उस ने कभी झूठ नहीं बोला था। उसे डर लग रहा था कि कहीं वह उसकी चोरी पकड़ ना ले।
आप कुछ कह रहे थे? वह प्रेम की नज़रों से उलझ गई।
मेरी बात को बहुत सुकून और ठंडे मन से सुनना। उसके बाद कोई फैसला लेना। लेकिन इतना याद रखना तुम्हारे हर फैसले में तुम्हारी मां की बेहतरी हो। प्रेम उसे देखते हुए कहता है। और अपनी बात शुरू करता है।
मैंने आफिस में बात कर ली है। तुम्हारी मां के इलाज की पूरी ज़िम्मेदारी कम्पनी ने ले ली है। और यह सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं है। बल्कि यह रूल कम्पनी के हर इम्प्लॉइज के लिए है।
और रही बात तुम्हारे जॉब की तो…प्रेम अपनी बात कह कर थोड़ा रूका।
तो…उसे जल्दी हुई जानने की।
तो तुम्हारा काम अगर कम्पनी को पसंद ना आया तो फिर भी तुम कम्पनी में तब तक काम करती रहोगी। जब तक कि तुम को कोई और जॉब नहीं मिल जाती।
अब बताओ क्या कहती हो? अपनी मां का इलाज कहां कराओगी। लेकिन इतना याद रखना यह हास्पिटल भी ओबेरॉय का ही है। इस लिए मैं यहां आया था। अपनी बात कह कर प्रेम खामोश हुआ। बहुत झूठ बोल दिया। वह मन ही मन सोचता है।
आपने मेरे लिए इतना सोचा…मेरे लिए यही बहुत है। मेरे लिए मेरी मां से बढ़ कर कुछ नहीं। लेकिन मेरे पास पैसा नहीं था इस लिए मैं यहां से जाने का सोच रही थी। आप की वजह से मेरी मां का अच्छा इलाज हो रहा है। वरना सरकारी अस्पताल में पता नहीं क्या होता। कहते-कहते वह रो पड़ी।
सुबह से मां की तबियत देखकर वह परेशान थी। लेकिन खुद को सम्हाले हुए थी। मगर वह टूट गई।
प्रेम बहुत आहिस्ता से उसे अपने कंधे से लगा लेता है।
प्रेम के ऐसा करते ही वह बेतहाशा रो देती है।
मुश्किल वक्त में तसल्ली के दो बोल, किसी अपने का कंधा, कोई हाथ जो मदद को आगे आ जाए। यही तो हैं ज़िन्दगी के असल रंग…
जारी है…
Comments
Post a Comment