धड़कन | भाग 25 | Dhadkan Part 25 | Heart Touching Hindi Love Story
हां ठीक है। लेकिन अब तुम देर मत करो। कहीं ऐसा ना हो कि सही वक्त के चक्कर में बहुत देर हो जाए। सुधीर जी उसे समझाते हैं।
जी अंकल ठीक है। अब मैं जा रही हूं।
ठीक है जाओ। और ज़्यादा कुछ सोचना मत।
श्लोका जवाब देने के बजाय सिर्फ मुस्कुरा दी। और ऊपर चली गई।
रूम में जाकर वह वैसे ही लेट गई। उसे अपने बाबा और उनकी बातें याद आ रही थी। और अपनी वह बातें जिस से उसने खुद को बांध रखा था। श्लोका सोचते हुए दूर बहुत दूर अपने गांव पहुंच गई।
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बाबा आपने सुधीर अंकल को क्यो बुलाया? क्या ज़रूरत थी। श्लोका बाबा पर नाराज़ होती है।
ज़रूरत थी बेटा तभी बुलाया है। पता नहीं मैं कितने दिन का मेहमान हूं। तुम्हारे बारे में सोच लूं तो मैं इत्मीनान से मर सकूंगा।
आप को कुछ नहीं होगा आप ठीक हो जायेंगे।
लेकिन ठाकुर साहेब उसकी बात का जवाब देने के बजाय अपनी बात कहते रहे।
तुम तो जानती हो सुधीर मेरा बचपन का दोस्त है। सुधीर के पिता जी बचपन में ही शहर जा बसे। और हम लोग यहीं रह गये। वह लोग जब भी गांव आते मिलते ज़रूर थे। और फिर वह लोग अपना सब कुछ घर और खेत सब बेच कर शहर चले गए। मैं जब भी शहर गया। उन लोगों से मिला। लेकिन इधर बहुत दिनों से जाना नहीं हुआ। सुधीर का फोन नंबर भी मुझ से खो गया। इस लिए आदमी को भेजना पड़ा।
दो-तीन दिन हो गया। लेकिन अभी तक वह आये तो नहीं। अब वह शहरी लोग हैं उनको अब गांव के दोस्त की क्या ज़रूरत? श्लोका अभी भी नाराज़ थी।
ठाकुर जी कोई आप से मिलने आया है। तभी एक बन्दा अंदर आ कर कहता है।
कौन है? ठाकुर जी ने पूछा।
शहर से आये हैं। सुधीर नाम बताया है।
जल्दी भेजो सुधीर को मेरे पास।
अरे कन्हैया यह क्या हो गया। सुधीर जी अपने दोस्त को इस हालत में देख कर हैरान रह गये।
तुम आ गये ना अब सब ठीक हो जायेगा। श्लोका तुम खाने का इंतेज़ाम करो। ठाकुर जी ने कहा।
नहीं अभी नहीं, तुम बताओ यह क्या हालत हो गई है तुम्हारी? सुधीर जी अभी भी हैरान थे। श्लोका बाहर चली गई। थोड़ी देर में एक नौकर खाने का बोलता है।
जाओ खाना खा लो फिर बात करते हैं। ठाकुर जी सुधीर जी को उठा देते हैं।
खाना खा कर वह वापस आ जाते हैं। श्लोका भी साथ में आ जाती है।
ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं। इस लिए तुम को बुला लिया। ठाकुर जी ने कहा।
मुझे पता ही नहीं था कि तुम्हारी यह हालत है वरना मैं पहले आ जाता। उस दिन मुझे कुछ काम था। तो मैंने सोचा काम निपटा कर चलूं तो दो तीन दिन आराम से तुम्हारे साथ रहूंगा। सुधीर जी ने वजह बताई।
कोई बात नहीं तुम आ गये यही बहुत है। मेरा सिर्फ इतना सा काम करना कि मेरी बेटी को शहर लेते जाना और कोई अच्छा लड़का देख कर इसकी शादी कर देना। मुझे इस की शादी का बहुत अरमान था। मगर मेरा यह ख्वाब अब पूरा नहीं हो सकता। मेरी बेटी पढ़ी-लिखी समझदार बच्ची है।
बाबा अब आप चुप हो जायें। मत बोलें वरना आप की तबियत बिगड़ जायेगी। और मेरी चिंता ना करें। आप ने मुझे इस लायक बना दिया है कि मैं अपना भला-बुरा खुद सोच सकती हूं। श्लोका नाराज़गी से कहती है उसे अच्छा नहीं लगता बाबा का इस तरह उन से कहना।
सुधीर जी ने बहुत ध्यान से एक नज़र श्लोका को देखा। और कुछ सोचने लगे।
कन्हैया तुम अपनी बेटी की फ़िक्र छोड़ दो। यह मेरी बहू मेरे शिवाय की दुल्हन बनेगी। सुधीर जी अचानक ही फैसला लेते हैं। और अपने दोस्त का हाथ पकड़ कर वादा करते हैं। सुधीर की बात सुनकर ठाकुर जी का चेहरा खिल जाता है।
नहीं अंकल आप कोई ऐसा वादा ना करें जिसे पूरा ना कर सकें। श्लोका नाराज़गी से कहती है। उनका बेटा कैसा है क्या करता है। उससे शादी करेगा भी या नहीं। और यहां यह वादा कर रहे हैं। श्लोका बहुत ज़्यादा नाराज़ हो जाती है।
अब यह मेरी बेटी भी है और बहू भी तुम निश्चित रहो। सुधीर जी श्लोका की नाराज़गी को नज़रंदाज़ करते हुए कहते हैं।
मान लेना मेरे दोस्त की बात बेटी। इस से बेहतर तुझे और कोई घर नहीं मिल सकता।
श्लोका बैठ कर बाबा का हाथ थाम लेती है। बाबा आप ठीक हो जाएं फिर हम इस बारे में बात करेंगे। श्लोका उन्हें मनाती है।
पहले तुम वादा करो कि हमारे वादे को निभाओगी? ठाकुर जी सख्त हो गये।
बाबा... श्लोका बेचारगी से कहती है।
ठीक है बाबा मैं वादा करती हूं। लेकिन.... श्लोका की बात अधूरी रह जाती है। क्योंकि उसे लगा कि बाबा के हाथ की पकड़ कुछ हल्की हो गई।
बाबा.... श्लोका ज़ोर से आवाज़ देती है। सुधीर जी चेक करते हैं और उन की आंख में आंसू आ जाते हैं।
श्लोका नासमझ नहीं थी। उस की चींख निकल जाती है। बाबा आप मेरी पूरी बात सुने बिना ही चले गए। यह आप ने अच्छा नहीं किया। श्लोका रोए जा रही थी। सुधीर जी उसे चुप करा रहे थे। मगर वह नाकाम हो गये। थोड़ी ही देर में सारा गांव वहां इकट्ठा हो गया। हर आंख नम थी। उन के प्यारे ठाकुर जी अब इस दुनिया में नहीं थे।
सुधीर जी ने भी घर पर बता दिया था। सुधीर जी बैठे सोच रहे थे कि अगर आज ना आता तो सारी ज़िन्दगी पछतावा रहता। वह समझ ही ना सके कि उनका दोस्त इतनी जल्दी उन्हें छोड़कर चला जायेगा। ऐसा लगा जैसे वह मेरे इंतेज़ार में थे। अपनी बेटी को मेरे सुपर्द करके उनको सुकून मिल गया।
अंतिम संस्कार हुए दो दिन हो चुके थे। रात का खाना खा कर श्लोका और सुधीर जी बैठे हुए थे।
देखो बेटा मैं तुम्हारे बाबा को तो नहीं वापस ला सकता। लेकिन तुम मुझे अपना बाबा मान सकती हो। और मैंने जो वादा अपने दोस्त से किया है वह मैं पूरा करूंगा यह मेरा वादा है। सुधीर जी ने बात शुरू की।
और अगर आपके बेटे ने आप की बात ना मानी तो?
क्यों नहीं मानेगा। मेरा शिवाय मेरी कोई भी बात नहीं टालता वह मेरी बात ज़रूर मानेगा। सुधीर जी बहुत यकीन से कहते हैं।
मतलब आप अपने बेटे पर मुझे ज़बरदस्ती थोपेंगे? श्लोका ज़ख्मी नज़रों से सुधीर जी को देखती है।
जारी है...
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