डोर धड़कन से बंधी भाग | 91 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 91 | Hindi Romantic Story
कौन हमें क्या समझता है। हमारे लिए यह मायने नहीं रखता है। हम क्या हैं… हमारे लिए यह ज़रूरी है।
आप ने जो किया वह गलत किया या सही… इस का फैसला तो मैं नहीं कर सकता। लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि हम कोई ऐसा काम ना करें कि एक वक्त के बाद हमें खुद पर ही पछताना पड़े।
अपनी बात कह कर शिवाय अपनी जगह से उठ गए। जैसे अब आप जा सकती हैं।
जाने से पहले एक बात पूछना चाहती हूं… वह भी उठ खड़ी हुई।
शिवाय उस की तरफ देखने लगे।
क्या आप ने कभी अपनी पत्नी को धोखा दिया है?
मैं अपने सही होने की गवाही किसी गैर को देना पसंद नहीं करता। और हम पति-पत्नी को एक दूसरे को सही होने का कभी सबूत नहीं देना पड़ा।
पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार से पहले विश्वास ज़रूरी है। आप एक-दूसरे से लाख प्यार करते हों। मगर आप को एक-दूसरे पर विश्वास नहीं है तो आप का प्यार दो कौड़ी का भी नहीं है।
शिवाय बहुत ही सख्त अल्फाज़ में अपनी बात कहते हैं।
खुशनसीब है आप की बीवी जिसे आप जैसा पति मिला। मिसेज अग्रवाल मुस्कुरा कर कहती हैं।
खुशनसीब तो मैं हूं कि मुझे ऐसी पत्नी मिली जो मुझे सही साबित करने के लिए खुद गलत नहीं होगी। बल्कि वह सही रहकर मुझे गलत साबित करने का हौसला रखती है।
वैसे एक बात कहूं…अपनी बात कह कर शिवाय थोड़ा रूके।
हमारा प्यार और हमारा विश्वास इन सही गलत से बहुत ऊपर है, क्योंकि हम ने रिश्तों को बचाने के लिए कभी ज़मीर का सौदा नहीं किया- हम जानते हैं कि जिस दिन इंसान अपने ही भीतर झूठ बोलना सीख ले, उस दिन कोई रिश्ता उसे नहीं बचा सकता। धोखा किसी तीसरे के आने से नहीं, अपने वजूद के गिरने से शुरू होता है, और हम ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहते जिसे निभाने के लिए खुद से नज़रें चुरानी पड़े।
अपनी बात कहकर शिवाय रूके नहीं, बल्कि आगे बढ़ कर बाहर निकल गए। शायद वह उस माहौल से बाहर आना चाहते थे। जो इस वक्त उनके कमरे का था।
मिसेज अग्रवाल भी खामोशी से बाहर निकल कर आगे बढ़ गईं। उन्होंने देख लिया था कि यह शख्स उन की मंज़िल नहीं है।
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अब आंटी की तबियत ठीक है। दोपहर तक उन को रूम में शिफ्ट कर देंगे। और कल तक तबियत ठीक रही तो एक दो दिन में छुट्टी भी मिल जायेगी। अभी मैं घर जा रहा हूं। कोई काम हुआ तो कॉल करना। अपना फोन नम्बर लिख दो। प्रेम अपना फोन उसकी तरफ करता है।
नताशा खामोशी से नम्बर लिख कर उसकी तरफ फोन कर देती है।
नाम?…
नताशा…
मैं प्रेम…नम्बर सेव कर लो। उसे फोन मिला कर वह कहता है।
ठीक है।
अब मैं जाऊं?
जी…
कोई भी काम हो तुरंत फोन करना। तुम्हारा लंच आ जाएगा। मैंने बोल दिया है। खा लेना। अब मैं रात में आऊंगा। सारी बातें बता कर प्रेम उसे देखता है।
आने की ज़रूरत नहीं है। फोन से पूछ लेना। और खाने के लिए भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। मैं कुछ खा लूंगी। वह अजनबी बन गई।
और प्रेम बिना कुछ कहे बाहर निकल गया।
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तुम दोनों ने मिलकर गांव को क्या से क्या बना दिया। श्लोका गर्व से राजवीर और अनु को देख कर कहती है।
यह सब सिर्फ हमारी वजह से नहीं हुआ। इसमें तुम्हारे और शिवाय का भी योगदान है। अनु श्लोका का हाथ थाम कर कहती है।
लेकिन तुम दोनों ने जो किया वह काबिले-तारीफ है। तुम यहीं बस गए। इतना पढ़े होने के बाद भी तुम ने शहर जाने के बजाए गांव में रहकर ही वह सारे काम किए। जिसकी गांव वाले को ज़रूरत थी। श्लोका गर्व से अपने भाई भाभी को देखती है।
अब आगे का क्या प्रोग्राम है आप लोगों का? राजवीर बहन से पूछता है।
बुजुर्गों और बच्चों के रहने के लिए घर तैयार ही है। और हैरत की बात यह है कि बहुत सारे बुज़ुर्ग गांव आना चाहते हैं।
शहर का माहौल बहुत तेज़ी से बिगड़ रहा है। अब लोग अपने बुजु़र्गों को अपने साथ नहीं रखना चाहते। आज हर किसी को आज़ादी चाहिए। आज की नस्ल शायद यह भूल गई है कि वह भी कभी बूढ़े होंगे। श्लोका अफसोस से कहती है।
शहर में ओल्ड एज होम की कमी नहीं है। और अगर हम यहां पर उन बुजुर्गों के लिए रहने और खाने का अच्छा इंतेज़ाम रखेंगे। तो यह उन के लिए बहुत ही अच्छा रहेगा।
तुम सही कह रही हो अनु…हम यहां पर उन को रहने के साथ रोज़गार भी देंगे। जिससे गांव में रोज़गार के अवसर बढ़ें। और यहां के लोग शहर जाने के बजाए गांव में ही रहें।
और वह अनाथ बच्चे जिनका कोई घर नहीं है। उन को यहां रख कर हम पढ़ाएंगे। उन्हें काबिल बनाएंगे ताकि आगे जाकर वह एक बेहतर ज़िन्दगी जी सके।
मौम हम यह ओल्ड एज होम और अनाथालय शहर में भी तो बनवा सकते हैं। पूजा जो खामोश बैठी उन की बातें सुन रही थी। सोचते हुए कहती है।
आज गांव का हर दूसरा शख्स शहर जाना चाह रहा है। लोगों को गांव से जोड़ने के लिए हम यह कर रहे हैं। हम यहां पर रोज़गार के इतने अवसर बना देंगे कि लोग शहर जाने का सोचें ही नहीं।
आज जो बच्चे इस अनाथालय में रहेंगे। वह खुद-ब-खुद गांव से जुड़ जायेंगे। और यहां पर बुज़ुर्ग लोगों को रखने का भी मकसद यही है कि वह इन बच्चों के साथ रहकर उन्हें संस्कार और सही राह दिखाए।
इस लिए तो हमने बुज़ुर्ग और बच्चों के साथ रहने का इंतेज़ाम किया है।
यह तो बहुत अच्छी बात है। पूजा खुश होती है।
हम यहां पर पढ़ाने वाली टीचर को इतनी सैलरी देंगे कि वह गांव आकर पढ़ाना चाहें। श्लोका खुशी से कहती है।
लेकिन इससे तो हमारा नुकसान होगा। पूजा परेशानी से कहती है।
आज हमारे पास पैसा है तो फिर क्यों ना इन पैसों को सही जगह लगाया जाए। तुम को शायद पता नहीं शिवाय ने कुछ विदेशी कंपनियों से बात की है। एक बार यहां पर कुछ कम्पनी आ गई। फिर हर कोई यहां आना चाहेगा। श्लोका उठते हुए कहती है।
शादी में चलना है ना? आज गांव में शादी है। न्योता आया था। जाना ज़रूरी है।
हां, मुझे चलना है, मुझे यहां की शादी देखनी है। मौम मैंने देखा है गांव वाले आपकी बहुत इज़्ज़त करते हैं। पूजा गर्व से कहती है।
तुम्हारी मौम भी उन सब को प्यार और सम्मान देती हैं। अनु गर्व से अपनी दोस्त को देखती है। जो थी तो गांव के गाठुर की बेटी, लेकिन उस जैसी गांव की एक आम सी लड़की से दोस्ती की।
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कैसी तबियत है आंटी? प्रेम रूम में आकर नताशा की मां से पूछता है। जिनको शाम को रूम में शिफ्ट कर दिया गया था।
ठीक है अब…तुम को परेशानी हुई नताशा ने बताया। वह धीरे-धीरे कहती हैं।
मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। वह नताशा को देख कर कहता है। जो कोई मैगज़ीन पढ़ रही थी। या फिर शायद पढ़ने का बहाना। प्रेम को ऐसा लगा।
आंटी की तबियत की वजह से वह उन से बात नहीं करना चाहता था। और नताशा अंजान बनी बैठी थी। प्रेम भी चुपचाप अपना फोन निकाल कर देखने लगता है।
आप को जाना नहीं है क्या? जब प्रेम को बैठे बहुत देर हो जाती है। और वह नहीं जाता है तो नताशा को उलझन होती है।
आप यहां हैं क्या? मुझे लगा आप किसी और दुनिया में हैं। प्रेम मुस्कुरा कर धीरे से कहता है।
ज़्यादा हीरो बनने की ज़रूरत नहीं है, अब आप जा सकते हैं। नताशा रूखे अंदाज़ में कहती है।
और प्रेम उसे देखता रह जाता है।
यह मेरी तो कुछ नहीं लगती, ना रिश्तेदार ना ही दोस्त… फिर मैं क्यों यहां हूं? ठीक है उसकी मां की तबियत खराब हुई। एडमिट करा दिया, बात खत्म।
जारी है…
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