डोर धड़कन से बंधी | भाग 95 | Dhadkan Season 2 – Door Dhadkan Se Bandhi Part 95 | Hindi Romantic Story

अमीरी-गरीबी की बहुत बड़ी दीवार उन के बीच खड़ी थी। जिस को चाह कर भी कोई नहीं हटा सकता है। इस बात को हर किसी ने महसूस किया। 

हम अपने प्रेम के लिए आपकी बेटी नताशा का रिश्ता लेकर आएं हैं। ममता जी विनम्रता से बात शुरू करती हैं।

आप सब इस रिश्ते के लिए खुशी-खुशी तैयार हैं? नताशा की मां बहुत सुकून से पूछती हैं।

जी, लेकिन आप ने यह क्यों पूछा? वह हैरान हुईं।

क्योंकि परिवार का साथ बहुत ज़रूरी होता है। कहते-कहते वह कहीं खो गईं।

आप बिल्कुल सही कह रही हैं। परिवार से ही घर बनता है। और मुहब्बत से रिश्ते बनते हैं। और हमें खुशी है कि हम सब साथ हैं। और बहुत खुश हैं। श्लोका गर्व से कहती है।

लेकिन मेरे साथ कोई नहीं…मैं अकेली हूं। और यह मेरी बेटी जो मेरे किए गए गलती की सज़ा काट रही है। वह उदासी से कहती हैं।

क्या बतलब? सब हैरान हुए।

मैं और शतीश नताशा के पिता…हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे। कालेज का दौर खत्म हुआ। शादी के चर्चे शुरू हुए। हम दोनों ने अपने परिवार में एक दुसरे के बारे में बताया। लेकिन दोनों ही परिवार वाले तैयार नहीं हुए। और फिर हम दोनों ने भाग कर शादी कर ली। और दूसरे शहर जाकर रहने लगे।

वह थोड़ा रूकीं…शायद उन का गला रूंध गया था।

हम दोनों जॉब करने लगे। और घर-परिवार से दूर अपना एक अलग संसार बसा कर रहने लगे। ज़िन्दगी सुकून से गुज़र रही थी। लेकिन जब नताशा की पैदाइश का वक्त आया तब हमें परिवार की याद आई। ऐसी वक्त में मैं चाहती थी कि मेरी मां मेरे साथ रहे। लेकिन वह पास नहीं थी। और इस की वजह मैं खुद थी। 

उसी वक्त मुझे समझ आया कि रिश्ते सिर्फ प्यार से नहीं बनते। बल्कि प्यार के साथ परिवार भी बहुत ज़रूरी है।

बहरहाल ज़िन्दगी आगे बढ़ती रही। और फिर हर कदम पर परिवार वालों की कमी और उन की याद सताने लगी। 

और फिर एक रात आफिस से घर आते हुए शतीश का एक्सीडेंट हो गया। और मौके पर ही उन की मौत हो गई।

उस वक्त मुझे शतीश की मौत के साथ किसी अपने के साथ ना होने का दुख भी था। कहते-कहते वह रो पड़ीं।

श्लोका उठकर खामोशी से उनके पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रख लेती है। शायद कहने के लिए इस वक्त उन के पास कुछ नहीं था।

आप कभी गईं नहीं उनसे मिलने? 

नहीं, किस मुंह से जाती। जाकर भी कोई फायदा नहीं था। उन लोगों को और तकलीफ होती। वह दुख से कहती हैं।

हमारे प्रेम के बारे में आप का क्या ख्याल है? श्लोका ने माहौल बदलने की कोशिश की।

अगर आप सब साथ हैं तो मुझे यह रिश्ता मंज़ूर है।  

तो ठीक है रिश्ता पक्का हुआ…अब यह बताएं शादी कब करेंगी? श्लोका मुस्कुरा कर कहती हैं।

जब आप कहें।

इस सैटरडे शादी, संडे रिसेप्शन रख लेते हैं। श्लोका सब को देख कर कहती हैं।

येहहहहह…बहुत मज़ा आयेगा। पूजा ज़ोश से कहते हुए प्रेम के गले लग जाती है।

इतना जल्दी?… कुछ वक्त मिलता तो मैं कुछ तैयारी कर लेती। वह धीरे से कहती हैं।

कोई बात नहीं हमारी आदत है झटपट शादी की। हम सब तैयारी कर लेंगे आप परेशान मत हों। शादी यहीं आप के घर पर होगी। और शादी के बाद आप भी हमारे साथ रहेंगी। श्लोका सब बात क्लियर करती हैं।

नहीं, मैं नहीं रह सकती। मेरी बेटी खुश रहे। मेरे लिए यही बहुत है। 

नहीं आप को हमारे साथ रहना है। आप अपना सामान भी पैक कर लेना। खाने का इंतेज़ाम हम करेंगे। आप मुहल्ले वालों और जानने वालों की लिस्ट बना कर हमें बता देना कि कितने लोग हैं। बाकी हम देख लेंगे।

ममता जी सारी बात साफ कर देती हैं।

आप लोग इतना सब कुछ…अपनी बात कहते-कहते वह रूक गईं।

आप परेशान ना हों। सब सादगी से होगा। श्लोका ने तसल्ली दी।

इसी बात पर मिठाई खाएं सब लोग…पूजा उठकर लाई हुई मिठाई का डिब्बा खोल कर सबके आगे करती है।

तैयार हैं ना मुझे अपनी ननद बनाने के लिए?…पूजा नताशा को मिठाई खिला कर पूछती है।

पूजा के ऐसा कहते ही नताशा की नज़र सीधे प्रेम पर जाती है। जो उसे ही देख रहा था।

जाओ नताशा खाने का इंतेज़ाम करो। उसकी मां खुशी से कहती हैं।

जी, कहते ही नताशा उठ जाती है।

चलिए मैं भी चलती हूं। पूजा भी साथ चली गई।

जब तक वह दोनों किचन में सब देखती हैं, तब तक वह लोग कमरे में बाकी सब फाइनल कर लेती हैं।

चाय के साथ बहुत सारी चीज़ें थीं जिसे सब ने मज़े से खाई।

सब के खाने के बाद नताशा और पूजा सब हटा कर किचन में रख देती है। प्रेम भी उठकर किचन में चला जाता है।

नताशा जैसे ही सामान रख कर वापस मुड़ती है प्रेम को देख कर हैरान रह जाती है। जो दीवार की टेक लगाए हाथ बांधे खड़ा था।

कुछ कहना है? प्रेम उस के चेहरे पर नज़र टिकाता है।

किस बारे में? वह हैरान हुई।

अंदर कमरे में अभी जो सब तय हुआ। उस बारे में।

मैं क्या कहूं?…उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। ऊपर से प्रेम के नज़रों की तपिश…

कुछ भी…प्रेम उसकी घबराहट देख कर मुस्कुरा दिया।

नहीं, मुझे कुछ नहीं कहना। वह बाहर निकलने लगी।

खुश हो ना?…वह उसके रास्ते में आया।

और वह ठहर कर उसकी आंखों में देखने लगी जिस में उसे सिर्फ खुशियां ही नज़र आई। अगर यह इस रिश्ते से खुश है तो मुझे भी खुश रखेगा। इस ने मुश्किल में मेरा साथ दिया। जब कि यह मेरा कुछ नहीं लगता। और अब यह शादी का फैसला… नताशा के मन में बहुत कुछ चल रहा था।

इतना ज़बरदस्त एक्स-रे… वह उसके इतना गौर से देखने पर मुस्कुरा कर कहता है।

और वह हड़बड़ा कर नज़रें हटा लेती है।

जवाब अभी भी बाकी है। वह सीरियस हुआ।

मुझे मां का हर फैसला मंज़ूर है। कहते ही वह बाहर निकल गई।

और प्रेम वहीं खड़ा अपने अंदर की टीसों को दबाने लगा जो अचानक से उसको परेशान कर गए। वह बाहर जाकर गाड़ी में बैठ गया।

यह सच है कि मैं तुम से प्यार नहीं करता। लेकिन मुझे यकीन है हमारा यह सफर बहुत खूबसूरत होगा। हम इस सफर को अपनी मुहब्बत से आगे ले जायेंगे। मेरे साथ एक बेवफा का दर्द है। जिससे तुम ही मुझे बाहर निकाल सकती हो। क्योंकि मैंने देख लिया है तुम दौलत से नहीं इंसानों से प्यार करती हो।

जारी है…

डोर धड़कन से बंधी भाग 94

डोर धड़कन से बंधी भाग 96









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