इश्क जान | भाग 10 | Ishq Jaan Part 10 | Heartfelt Romance & Wedding Story

अब मैं पीछे नहीं देखूंगी। जो मेरी किस्मत में है, उसे अपना बना कर जिऊंगी।

कभी-कभी ज़िंदगी हमें वह नहीं देती जो हम चाहते हैं... बल्कि वह मिलता है जो हमारी किस्मत में होता है।

मुहब्बत हारती नहीं...

वह बस चुप हो जाती है।

वह सिसकती है, मगर ज़िंदा रहती है।

वक्त की तहो में कहीं गहराई बनाकर,

हमेशा के लिए वहीं छुप जाती है....

....

विदाई हो रही थी।

गाड़ियों की लाइन लगी थी। बेटी की बिदाई थी। हर आंख नम थी।

और फिर गाड़ियां आगे बढ़ने लगीं।

आंसुओं के साथ वह एक नए सफर की ओर बढ़ चुकी थी।

मेहमान जा रहे थे। सामानों को समेटा जा रहा था। बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया स्टेज उजाड़ा जा रहा था। 

थोड़ी देर पहले जो सब सजा-संवरा था। सब उजड़ रहा था।

खूबसूरती से सजे गुलदस्ते बिखरने लगे थे।

दुल्हन अपने ससुराल पहुंच चुकी थी। तमाम रस्मों के बाद उसे उसके कमरे में बैठा दिया गया था।

एक और इम्तिहान जिससे उसे गुज़रना था। वह प्यार नहीं था उसका। लेकिन उसने कुबूल कर लिया था। दिल से ना सही, लेकिन दिमाग में यह बात बैठा ली थी कि यही उस का सब कुछ है।

आने वाली हर आजमाइश के लिए वह खुद को तैयार कर रही थी।

तन्हाई के यह कुछ पल... खुद को मज़बूत करने के लिए उसे मिल गए थे।

दरवाज़े पर आहट हुई। और वह खुद में सिमट गई।

नया घर, नये लोग, नए रिश्ते....और अब यह नया जीवन। 

...

दो साल बाद...

एक और शादी…

इस बार शादी किसी और की थी, लेकिन दास्तां वही थी…

सजावट, संगीत, रिश्तेदार…और कुछ अधूरी कहानियों की परछाइयां।

और फिर दो दिल…दो नज़दीकियां…दो अधूरी मुहब्बतें आमने-सामने।

रात की महफिल रंग पकड़ रही थी।

शजल वहां अपने परिवार के साथ पहुंची थी। अब वह शादीशुदा थी, रिहान की पत्नी।

सब कुछ ठीक था…दिखाने के लिए।

पर अंदर कहीं, अब भी एक कोना ऐसा था… जो अभी खाली था।

उसी शाम परमजीत भी वहां पहुंचा…सूट पहने, चेहरे पर हल्की मुस्कान, लेकिन आंखें अब भी जैसे बीते लम्हों की कैदी थीं।

जब शजल ने उसे देखा…

वक्त थम गया।

दोनों आमने-सामने थे, लेकिन नज़र उठते ही झुक गई।

शायद दिल बहुत गहराई में रोया था। वह एक पल के लिए उठी नज़र शायद सब कुछ कह गई।

भीड़ के बीच एक खामोश कोना बन गया।

शजल दूसरी तरफ बढ़ी।

उसका दिल बेकरार था।

वह अब भी खुद से लड़ रही थी।

जैसे खुद को समझा रही हो, तू अब किसी की बीवी है…

रात गुज़र रही थी। और हर गुज़रते वक्त के साथ एक अध्याय भी मिट रहा था।

शजल रीत के पास बैठी हुई थीं।

रज़ील ने शादी कर ली। रीत ने खबर दी।

हूं, सुना मैंने भी। 

मैंने सुना अपनी शादी से वह खुश नहीं है। घर वालों के कहने पर शादी तो कर ली। लेकिन निभा नहीं पा रहा।

उसकी बीवी को उसके मुहब्बत की भनक लग गई है। रीत ने उसकी आंखों में देखा। जहां सवाल थे। कौन सी मुहब्बत?

वही जो वह तुमसे करता था। रीत कहकर चुप हुई।

वह मुहब्बत जिससे किसी को कोई खुशी नहीं हुई। लेकिन उस मुहब्बत की चर्चा हर तरफ है। रीत दुख से बोली।

यह तुम क्या कह रही हो? रीत हैरान हुई।

जो कह रही हूं सही कह रही हूं। शजल खोए अनदाज़ में बोली। उसका ध्यान कहीं और भी था।

तुम्हारा ध्यान कहां है? रीत ने उसकी आंखों के आगे हाथ लहराया।

यहीं है और कहां रहेगा‌। शजल उसकी ओर देखती है।

तुम अपनी ज़िंदगी में खुश हो? रीत शायद कुछ जानना चाहती थी।

हां, क्यों? शजल इस बार मुस्कुरा दी।

अब दोस्त को भी झूठी मुस्कान से बहलाओगी?

रीत के शब्द उसके दिल को लगे।

रीत धीरे से शजल का हाथ थाम लेती है।

रीत के ऐसा करते ही शजल की आंख नम हो जाती है।

कह दो जो भी दिल में है मैं सुन रही हूं। रीत उसके हाथ को पुश करती है।

इश्क की दास्तां भी क्या दास्तां है...

एक बार जो शुरू हो जाए तो फिर उसको रोक पाना आसान नहीं होता।

चाहे इंसान लाख कोशिश कर ले,अपने दिल को समझा ले, रिश्तों की बंदिशों में खुद को बांध ले...

लेकिन मुहब्बत खुद ही अपना रस्ता बना लेती है।

कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अधूरे रह जाते हैं और कुछ अधूरे रिश्ते उम्र भर दिल में ज़िंदा रहते हैं।

रिहान मुझसे नफरत करता है...

जारी है...


इश्क जान भाग 9

इश्क जान भाग 11










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