इश्क जान | भाग 9 | Ishq Jaan Part 9 | Heartfelt Romance & Wedding Story
काश वह मां को मना लेता। पछतावा उस के दिल में घिर कर गया।
वह सामने से नज़र हटा कर मेहमानों से बातें करने लगा।
शादी मुबारक हो परमजीत....
परमजीत के कानों में एक मीठी सी खनकती आवाज़ आई।
उस ने आवाज़ की तरफ देखा। और देखते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया। उसका मुस्कुराता चेहरा कहीं बहुत पीछे चला गया। वह थैंक्स भी ना कह सका।
शजल की आंखों से कुछ भी न छिप सका।
दुल्हन किसी और से बातों में बिज़ी थी। परमजीत को मौका मिल गया। खुद को नार्मल करने का।
सुनो...शजल मुड़ी तो परमजीत ने आवाज़ दे दी।
वह ठहर गई, लेकिन मुड़ी नहीं। क्योंकि इस वक्त वह इस पोज़ीशन में नहीं थी कि परमजीत से नज़र मिला सके वरना उसका वह राज़ जो उस के दिल में था खुल जाता। वह अपनी मुहब्बत को रूसवा नहीं करना चाहती थी। बड़ी मुश्किल से वह खुद को स्टेज तक लाई थी।
तुम को भी एडवांस में शादी की मुबारकबाद... परमजीत मुस्कुराया।
एक खोखली मुस्कान...जिस के पीछे ना जाने कितने अरमान दम तोड़ गए।
मैं आई ना...
आप को भी आना है।
एक झटके से वह मुड़ी। और अपनी बात कह कर वापस घूम कर स्टेज से उतर गई। उसका जवाब सुने बिना।
और परमजीत अपने अंदर के टीसों को दबाता खुद को नार्मल करने लगा।
शजल तुम को महसूस करते ही मुझे खुशी मिलती थी। और जब मैंने तुम को अपनाने का फैसला किया तो मुझे सुकून मिल गया था। मुझे लगा तुम मुझे मिल जाओगी। लेकिन मैं गलत था।
जब मैंने मां से तुम्हारे बारे में बात की तो वह सुनते ही गुस्सा हो गई। उन को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था। वह मेरी शादी अमृत से करने का सोच रही थी।
मैं जब अमृत से मिला तो हैरान रह गया। वह एक गहरे सांवले रंग की बड़े बाप की बेटी थी। उसे देख कर मुझे कोई खुशी नहीं हुई।
लेकिन मां को वह बहुत पसंद थी। या फिर शायद उसकी वह दौलत...जो तुम्हारे पास नहीं थी।
मैंने मां को मनाने की कोशिश की। लेकिन वह अपनी बात पर अटल रही।
और जब मैंने ज़िद की तो वही ममता की दुहाई।
मैंने अपनी मुहब्बत को अपनी मां की खुशी के लिए कुर्बान कर दी।
शादी की रस्मों को करते हुए अपने पास खड़ी अमृत को देखता तो तुम्हारा चेहरा आंखों में आ जाता शजल।
मैंने अपने दर्द को अपने अंदर छुपा लिया है। जिसे सारी ज़िन्दगी कोई नहीं देख पायेगा।
किन सोचों में गुम हो भाई? कब से मुबारकबाद दे रहा हूं। परमजीत का दोस्त हंसते हुए कहता है। और परमजीत उस दुनिया से वापस आ जाते हैं। जहां अब उन का बसेरा मुमकिन नहीं था।
...
एक के बाद शादियां हो रही थी। हर कोई शादियों में बिज़ी था।
और फिर शज़ल की भी शादी का दिन आ गया। स्टेज पर दुल्हन के रूप में बैठी वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। हर कोई उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा था।
हर कोई उसे मुबारकबाद दे रहा था। लेकिन पता नहीं क्यों उसे किसी का इंतेज़ार था। हर आने वाले पर उस की नज़र उठ जाती। लेकिन वह नहीं आ रहा था। जिसका उसे इन्तेज़ार था।
तुम्हारी किस्मत के क्या कहने.... तुम को रज़ील पसंद करता है। और तुम परमजीत को पसंद करती हो। रिश्ता तुम्हारा राहिल के आया। और अब शादी रिहान से हो रही है।
रीत शज़ल के बगल में बैठते हुए धीरे से कहती है। जो आज ही दुबई से सिर्फ उसकी शादी के लिए आई थी।
लास्ट टाइम मैं आई थी तो तूने मुझे बताया कि तेरा रिश्ता राहिल के लिए आया है। और रिश्ता पक्का भी होने वाला था। क्योंकि तुम्हारे परिवार को यह रिश्ता पसंद था। फिर यह रिहान कहां से आ गया?
रीत हैरानी से पूछती है।
शायद इसी को किस्मत कहते हैं। शजल धीरे से बोली।
तूने घर वालों को मनाने की कोशिश नहीं की। रज़ील या परमजीत से शादी करने लिए।
किस बिना पर करती। और अब यह सब बातें करने का कोई फायदा नहीं है। आज मेरी शादी का दिन है।
शजल बात को खत्म करती है।
वैसे तेरी निगाहें किसे ढूंढ रही हैं? परमजीत को या रज़ील को? रीत उसकी नज़रों से अंजान न थी।
शज़ल खामोशी से रीत को देखती है।
रज़ील अगले हफ्ते आ रहा है। उसे तुम्हारी शादी अटेंड करने की हिम्मत नहीं थी।
और परमजीत अपनी नई बीवी के साथ घूमने में बिज़ी है।
रीत ने खबर दी।
इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि थोड़ी देर के लिए मेरी शादी में आ जाता?
शज़ल शिकवा कर बैठी।
बात फुर्सत की नहीं, दिल की है यार... मैं तुझे बोलना नहीं चाहती थी। लेकिन अब बता दूं। परमजीत तुझ से शादी करना चाहता था। लेकिन उसकी मां राज़ी नहीं थी।
क्या? शज़ल हैरान हुई।
हां, यह सच है। रीत उसका हाथ पकड़ कर कहती है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि तेरी किस्मत पर रश्क करूं या अफसोस? रीत के अल्फाज़ में दर्द थे।
शज़ल की आंखे भर आई थीं, मगर उसने आंसुओं को गिरने नहीं दिया। आज उसकी आंखों का काजल बहने नहीं देना था, आज वह दुल्हन बनी थी, टूटी हुई नहीं दिखना चाहती थी वह।
रीत उसकी चुप्पी को पढ़ चुकी थी।
कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में देर से आते हैं, और कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी से जल्दी चले जाते हैं...रीत धीमे से बोली।
लेकिन कुछ तो ऐसे भी होते हैं, जो पूरी ज़िंदगी हमारे दिल में रहते हैं...बिना कुछ कहे, बिना कुछ किए...
शजल का जवाब जैसे खुद-ब-खुद उसकी ज़ुबान पर आ गया।
स्टेज के सामने भीड़ थी, रिश्तेदार थे, कैमरे थे, लेकिन शज़ल की नज़र अब भी दरवाज़े पर थी। उम्मीद का एक कोना अब भी बाकी था।
शायद उसके बेकरार दिल की ख्वाहिश थी। एक बार परमजीत उसे दुल्हन बना देख ले।
शादी की मिठाई खाओ बेटा... कोई बुजुर्ग औरत उसके पास मिठाई की प्लेट लिए आईं।
शज़ल ने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया। मगर उसकी आंखें अब भी एक चेहरे को तलाश रही थीं.... परमजीत आ जाओ...एक बार....दिल की ख्वाहिश भी अजीब होती है। दुल्हन किसी और की बनी बैठी है। मगर दिल किसी और के लिए बेचैन था।
तभी....
हॉल के दरवाज़े से एक परछाई अंदर दाखिल हुई। सफेद कुर्ता-पायजामा, आंखों पर चश्मा, चेहरे पर थकावट और दिल में अधूरी मुहब्बत की टीस।
शजल की धड़कन जैसे थम सी गई।
परमजीत...उसने होंठ हिले।
रीत ने भी उसी तरफ देखा और एक गहरी सांस ली।
परमजीत ने स्टेज की तरफ देखा... नज़रें मिलीं...शज़ल और परमजीत के बीच एक लम्बी खामोशी का पुल था...जिस पर सिर्फ उनकी आंखें चल रही थीं।
परमजीत ने आंखें झुका लीं, और एक बार फिर उन जज़्बातों को दबा लिया, जो अब कोई मायने नहीं रखते थे।
और फिर वह आगे बढ़ा, और मेहमानों की भीड़ में गुम हो गया।
शज़ल की आंख से एक आंसू गिरा।
बस, अब और नहीं...वह बुदबुदाई।
रीत चौंकी।
शजल ने टिश्यू से आंसू पोंछे, और खुद को संभालते हुए कहा।
अब मैं पीछे नहीं देखूंगी। जो मेरी किस्मत में है, उसे अपना बना कर जिऊंगी।
कभी-कभी ज़िंदगी हमें वह नहीं देती जो हम चाहते हैं... बल्कि वह मिलता है जो हमारी किस्मत में होता है।
मुहब्बत हारती नहीं...
वह बस चुप हो जाती है।
वह सिसकती है, मगर ज़िंदा रहती है।
वक्त की तहो में कहीं गहराई बनाकर,
हमेशा के लिए वहीं छुप जाती है....
जारी है...
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