सांझ | Hindi Emotional Story | Heart Touching Kahani




सांझ....

ठंडी हवाएं चल रही थी। आसमान पर काले बादल घिर आये थे। दिन भर रौशनी बिखेरने के बाद सूरज भी अपने घर की ओर चल पड़ा था।

गांव की औरतें घर के कामों से फुर्सत पाकर बाहर बरगद के पेड़ के नीचे इकठ्ठा होने लगी थी।

बूढ़ी अम्मा भी अपनी लकड़ी की छड़ी के सहारे घर से बाहर आ रही थी।

वहां पर बैठी औरतें बूढ़ी अम्मा को देख कर खुश हो गई। क्योंकि बूढ़ी अम्मा रोज़ नहीं आती थी।

चबूतरे पर हर कोई बैठा बातें कर रहा था।

तभी बसंती गुस्से से लाल चेहरा लिए आती है। और खामोशी से बैठ जाती है।

क्या हुआ बसंती इतना गुस्सा क्यों हो? 

बूढ़ी अम्मा टटोलती नज़रों से पूछती हैं।

क्या बताऊं अम्मा? यह तो रोज़-रोज़ की बात हो गई है। रोज़ ही किसी ना किसी बात पर हमारी लड़ाई हो जाती है। बसंती उदासी से कहती है।

तो तुम लड़ती ही क्यों हो? खामोश रह जाया करो। बूढ़ी अम्मा समझाती हैं।

मैं कहां लड़ना चाहती हूं। लेकिन बात ही ऐसी हो जाती है कि बात बढ़ जाती है।

बसंती धीरे से कहती है। 

उसे अच्छा नहीं लगा इस तरह घर की बात सब के सामने करते हुए।

लेकिन बूढ़ी अम्मा ने पूछा तो वह चुप ना रह सकी।

अब आगे से कुछ बात हो तो खामोश रहना। बूढ़ी अम्मा ने नसीहत की। बेकार की लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होता। लेकिन घर का माहौल ज़रुर खराब हो जाता है।

कैसे खामोश हूं अम्मा? बात मेरी होती तो खामोश रह जाती। लेकिन बात मेरे बच्चों की है। मैं खामोश नहीं रह सकती।

सुमन का कालेज में एडमिशन कराना है। राहुल को कालेज जाने के लिए मोटरसाइकिल चाहिए। मैं कब से कह रही हूं। मगर सुमन के बाबा सुनते ही नहीं। और फिर इसी बात पर लड़ाई हो जाती है।

बसंती बोल ही देती है। कब से उसके दिल में भरी हुई थी। आज कह कर उसने अपना जी हल्का कर लिया।

यही तो हम मांओं की परेशानी है। बच्चों के लिए सारी ज़िन्दगी लड़ते हैं। कभी समाज से कभी रिश्तेदार से और अपने पति से तो बच्चों के लिए रोज़ लड़ते हैं।

हम भूल जाते हैं कि वह भी बच्चों का बाप है। लेकिन नहीं हमारे जैसा प्यार बाप करते कहां हैं।

वह पति जो कल तक हमारा सब कुछ था। बच्चों के बाद वही हमारा दुश्मन हो जाता है।

और हम सिर्फ बच्चों के होकर रह जाते हैं।

और फिर वही बच्चे पढ़ लिख आगे बढ़ जाते हैं। और हम रह जाते हैं तन्हा।

वह मां जिसके लिए बच्चे सब कुछ थे। आज उन बच्चों के लिए मां कुछ नहीं।

वह औरत जो बच्चों के लिए छोटी-छोटी बातों पर लड़ पड़ती थी। आज बुढ़ापे में खामोश बैठी दीवार को तक रही है।
कोई नहीं है उस के आसपास जिससे वह दो बातें कर लें। कोई नहीं ऐसा जिससे वह अपने दिल का दर्द कह सके।
इस लिए अब लड़ाई मत करना बच्चों के लिए। तुम पति-पत्नी मिलजुल प्यार से रहो। 

बूढ़ी अम्मा समझाते हुए कहती हैं।

जिसे सुनकर वहां बैठी औरतें समझ जाती हैं कि बच्चों का भविष्य बनाना है। लेकिन उस के लिए अपना सुख और प्यार कुर्बान नहीं करना है।

वह जो किसी ने कहा था कि जो जब जागे तभी सवेरा। लेकिन आज सांझ (शाम) को ही उनकी ज़िंदगी में सवेरा हो गया था।

-Little_Star


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एक आदमी सड़क पे पैदल चला जा रहा है। शहर धीरे धीरे उसके नजदीक आ रहा है। या कह लो वह शहर की ओर चला जा रहा है।
क्या आप कोई लघुकथा लिख सकते हो कि पता चले कि शहर आ गया है?



एक आदमी सड़क पे पैदल चला जा रहा है। शहर धीरे धीरे उसके नजदीक आ रहा है। या कह लो वह शहर की ओर चला जा रहा है।

सूरज अपनी चमक के साथ वापस जा रहा था। अंधेरा होने को आ रहा था। लेकिन उस के कदम नहीं रूक रहे थे। वह निरंतर चलता रहा। माहौल बदल चुका था। गांव की पगडंडी और कच्चे मकान से अलग पक्की सड़क और ऊंची इमारतें अपनी पहचान बता रही थी।

सीधे-सादे चेहरे की जगह खूबसूरत चमकते चेहरे नज़र आने लगे थे। ठहरी हुई ज़िंदगी से तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी दिखने लगी थी।

उसने ठहर कर डरते-डरते एक शख्स से रहने का ठिकाना पूछा।

लेकिन वह उस का सवाल सुनकर "नहीं जानता" कह कर आगे बढ़ गया।

उसके कानों में अपने काका की आवाज़ गूंजी" शहर में कोई किसी का नहीं होता" वह आगे बढ़ा। फिर वही सवाल किया। वह उसे लेकर एक जगह गया। हाथ मुंह धोने के लिए कहा। 

अपना सामान वहीं रखकर वह हाथ मुंह धोने लगा। हाथ-पैर धोकर उसे अच्छा लगा। फ्रेश होकर पीछे मुड़ा। और हैरान रह गया।

उसका सारा गायब था। उस के वह पैसे जो बाबा ने उसे दिये थे। उन की ज़िंदगी भर की मेहनत। कुछ भी नहीं बचा था। और वह आदमी भी नहीं था जो उसे लेकर आया था।

उसके कानों में काका की आवाज़ गूंजी "शहर के ठग से सावधान रहना"

खाली हाथ, भूखे पेट, उदास मन से वह आगे बढ़ा। थकान, उदासी, निराशा और खाली पेट। वह वहीं बैठ गया। दीवार से सिर टिका कर आंख बन्द ली।

कोई आस, कोई उम्मीद, कोई सामान कुछ नहीं बचा था। तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा। उसने झट से आंख खोल दी।

नये लगते हो। और भूखे भी। आओ खाना खा लो। और मेरे साथ मेरी खोली में चलो। सुबह मेरे साथ चलना मैं काम दिला दूंगा।

वह हैरानी से उस शख्स को तकता रहा। उस के कानों में काका की आवाज़ गूंजी "शहर में लाख बुराइयां सही मगर वहां अच्छाइयां भी है" 

उसकी आंख नम थी। मगर उस के होंठ मुस्कुरा उठे। क्योंकि उसे पता चल गया था कि शहर आ गया है। उसने मन ही मन कहा "मैं शहर में हूं"।









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