रूबरू | Part 17 | Rubaru – A Hindi Story of Love and Relationships

अच्छा, तो फिर तुम्हारा ध्यान कहां हैं?...वह अचानक से उठ कर दादी वाली खाली चेयर पर बैठ कर उसकी तरफ झुक गया।

मायरा का लगा जैसे उसकी धड़कनें उसकी खामोशी को तोड़ देंगी।

ताबिश अब उससे एक सीट दूर नहीं... बल्कि बिल्कुल पास था।

उसने अपने हाथों में पकड़ा मग और कस लिया।

मेरा ध्यान... कहीं नहीं है।

उसने धीरे से कहा, लेकिन उसकी आवाज़ उसका साथ नहीं दे रही थी।

झूठ।

ताबिश की आवाज़ धीमी थी...मगर सीधे उसके अंदर उतर गई।

अगर ध्यान नहीं है...तो डर क्यों है?

वह थोड़ा और झुका।

मैंने कहा न कि मुझे डर नहीं लग रहा।

इस बार मायरा ने खुद को संभालते हुए कहा।

अच्छा फिर यह बताओ ऐलन हीरा चुराने में कामयाब हो जाएगी?

ताबिश की नज़र उसके चेहरे पर टिक गई।

उसने अचानक से टॉपिक बदल दिया। और फिल्म की बात करने लगा। जिसकी हीरोइन ऐलन हीरों को चुराने की कोशिश में लगी थी।

मायरा की नज़र स्क्रीन पर ठहर गई।

इरादे नेक हों तो मंज़िल मिल ही जाती है।

मायरा की आंखों में अचानक सख्ती उतर आई।

अच्छा...फिर चाहे वह चोरी ही क्यों न हो? ताबिश के होंठों पर बेसाख्ता मुस्कान छा गई।

आपका ध्यान शायद फिल्म में नहीं था...वरना आप देख पाते कि हकीकत में वह हीरे ऐलन के ही हैं। मुस्कुराने की बारी अब मायरा की थी।

मायरा की मुस्कान देखकर उसे गुस्सा नहीं आया। ताबिश को खुद पर सबसे ज़्यादा हैरत यही थी।

मैं जा रही हूं...आप ध्यान से फिल्म देखें। कहते ही मायरा उठ गई। 

तुम कहां जा रही हो? मैं अकेले फिल्म नहीं देखता। ताबिश ने उसे रोकना चाहा।

ऐलन है न यहां...कहते ही वह दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

मेरे लिए एक कप चाय लेकर आओ।

ताबिश की बात पर उसके कदम रूक गए।

मैं नहीं बनाऊंगी...आप रहीमन से बोल दें। कहते ही बाहर निकल गई ताबिश का जवाब सुने बिना।

कमरे में जाकर चेंज करते हुए उसका मन ताबिश की बातों की ओर चला गया।

आज ताबिश का रवैया काफी अच्छा था... ऐसा क्यों? 

मायरा लेटने के बाद भी उसके रवैए पर गौर करती रही।

ताबिश चाय का किसी से भी बोल सकते थे। लेकिन उन्होंने मुझसे ही क्यों बोला?

सोचते हुए वह उठकर बैठ गई।

बना देती हूं चाय...यही सोचते हुए वह किचन की ओर चली गई।

हाथ में चाय का मग थामे वह होम थियेटर का दरवाज़ा नॉक करती है। 

अंदर से आवाज़ न आने पर वह दरवाज़ खोलकर अंदर चली जाती है।

लेकिन अंदर का माहौल देखकर वह हैरान रह जाती है।

स्क्रीन पर फिल्म चल रही थी। लेकिन फिल्म की आवाज़ बंद थी।

कमरे में सिर्फ स्क्रीन की नीली रौशनी थी... और उस रौशनी में उसके आंसू साफ दिख रहे थे।

ताबिश को रोता देख वह हैरान रह गई। बंद आंखों से आंसू की लड़ियां उसके गालों पर बह रही थीं।

आपकी चाय... मायरा चाय रखकर धीरे से कहती है।

मायरा की आवाज़ पर ताबिश आंखें खोलकर उसकी ओर देखता है।

बिना इजाज़त तुम अंदर कैसे आई? ताबिश गुस्से से उठ खड़ा हुआ।

मैंने नॉक किया था... कोई जवाब नहीं आया तो मैं अंदर आ गई।

मायरा ने सफाई दी।

जवाब नहीं आया तो अंदर आ गई...दोबारा नॉक करती।

ज़रा सा साथ क्या बैठा लिया, तुम तो अपनी हदें ही भूल गई।

कहते हुए ताबिश गुस्से से उसका हाथ पकड़ कर दरवाज़े तक ले गया। और दरवाज़ा खोलकर उसको बाहर करके दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर देता है।

बाहर खड़ी मायरा को ऐसा लगा कि उसके पैरों में जान नहीं है।

इतनी बेइज़्ज़ती...

उसके कानों में अब भी उसकी बातें गूंज रही थीं। जैसे हर शब्द उसके अंदर तक काट गया हो।

वह हैरान थी ताबिश के रवैए पर। कैसे वह उसको इस तरह बाहर निकाल सकता है।

शायद गलती मेरी ही थी। मुझे इस तरह बिना नॉक के अंदर नहीं जाना चाहिए था। खुद को तसल्ली देती वह अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

वहीं दूसरी ओर ताबिश अपने रवैए पर हैरान था। 

ऐसा तो वह कभी किसी के साथ नहीं करता था। 

उसने मुझे उस हाल में देख लिया... जहां मैं खुद को भी नहीं देखना चाहता।

मैं नहीं चाहता कि मेरा दुख कोई  देखे। 

शायद इस बात पर मुझे इतना तेज़ गुस्सा आया था। वह खुद से बातें कर रहा था।

जब कुछ समझ नहीं आया तो चाय की कप उठाकर होंठों से लगा लिया।

एक तो उसने मेरे लिए चाय बनाई। और बदले में उसे क्या मिला? डांट और बेइज़्ज़ती... 

चाय के हर घूंट के साथ उसे अपनी कड़वाहट का एहसास हो रहा था।

और जब मन शांत नहीं हुआ तो फिल्म की आवाज़ तेज़ कर दी। लेकिन उसके अंदर का शोर उससे भी ज़्यादा था।

....

अगला दिन मायरा पूरे दिन दादी के साथ ही रही। उनकी तबियत कुछ ठीक थी। हल्का बुखार भी था। 

ताबिश सारा दिन बिज़ी रहा।

रात में वह दादी के पास आया। उनको बीमार देखकर वह परेशान हो गया।

दादी आपकी तबियत खराब थी तो आपने मुझे बताया क्यों नहीं। ताबिश दादी के पास बैठकर उनका हाथ अपने हाथ में ले लेता है।

थोड़ा सा बुखार है... ठीक हो जायेगा। दादी हल्की हंसी हंस पड़ी।

दादी ने खाना खाया? वह मायरा की तरफ घूमा।

जी, खाना खिलाकर दवा दे दी है। बुखार भी चेक कर लिया था। नार्मल था।

वह सारी जानकारी देती है।

ठीक है... तुम दादी के पास ही रहना। कोई भी ज़रूरत हो पहले मुझे इंफार्म करना। कहते ही वह उठ खड़ा हुआ।

वह खामोश खड़ी रह गई।

उसके मन में इस वक्त ताबिश को लेकर बहुत सारे सवाल थे। 

कल रात की बात के बाद वह ताबिश को जानना चाहती थी। 

उसका मन बार-बार ताबिश की ओर जा रहा था। वह ताबिश की हकीकत जानना चाहती थी। वह उसके उन आंसुओं की वजह जानना चाहती थी जो उसने उसकी आंखों में देखे थे। 

लेकिन दादी की बीमारी की वजह उनमें उलझ गई। मगर उसका मन ताबिश की ओर लगा रहा।

मायरा...

जी दादी...दादी के पुकारने पर वह हकीकत में आ गई।

मुझे पानी दे दो। फिर तुम भी अपने कमरे में जाकर आराम करो। यहां पर रूकने की ज़रूरत नहीं है। ताबिश वैसे ही परेशान हो जाता है। 

नहीं दादी मैं यहीं पर रहूंगी। मुझे कोई दिक्कत नहीं है। वह उनको सहारा देकर उठाकर पानी देती है।

पानी पीकर वह दोबारा लेट जाती हैं।

मायरा उनके करीब बैठकर उनका सिर सहलाने लगती है।

दादी भी आंख बंद कर लेती हैं।

रात बीतती जा रही थी। अब मायरा को भी नींद आ रही थी लेकिन वह दादी को छोड़कर नहीं जा सकती थी। यह उसकी ड्यूटी थी। जिसे उसे निभाना था।

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई दादी के बिस्तर पर सोने की?...

जारी है...

रूबरू भाग 16

रूबरू भाग 18









Comments

Popular posts from this blog

कुछ अनकही (कालेज वाला प्यार) भाग 1 | Kuch Ankahi: Unspoken College Love Story Part 1 | Emotional Hindi Romance

रूबरू | Part 1 | Rubaru – A Hindi Story of Love and Relationships

धड़कन | भाग 1| Dhadkan Part 1 | Heart Touching Hindi Love Story